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Showing posts from September, 2020

रासोकाव्य की प्रमुख विशेषताएं:----

हिन्दी के आदिकाल या वीरगाथाकाल के काव्य प्रबंध काव्य तथा मुक्तक वीर गीतों के रूप में उपलब्ध है. इन की प्रवृति वीर रस प्रधान है और ये रासो कहलाते हैं.                           दल पति विजय का 'खुमानरासो' वीरगाथा काल का प्रबंध काव्य है. इस ग्रंथ में कवि भोज के पश्चात मेवाड़ के सिंहासन पर बैठने वाले गुमान द्वितीय के युद्धों का सजीव चित्रण है. विद्वानों का विचार है कि 'खुमानरासो' की मूल प्रति में प्रक्षिप्त अंश समाविष्ट किया गया है. इसकी भाषा राजस्थानी है तथा विविधमुखी छंदों का प्रयोग हुआ है. यह अत्यंत सरस रचना है. नरपति नाल्ह का 'विसलदेव' रासो गेय मुक्तक परंपरा का प्रतिनिधित्व ग्रंथ है. इतिहासकारों ने इसे वीर काव्य माना है लेकिन वस्तुतः यह प्रेमाख्यान की कोटि में है. इसमें विवाह के बाद दाम्पत्य प्रेम के विकास का चित्रण है इस ग्रंथ के रचना काल, रचयिता और चरित्र नायक विवाद ग्रस्त है. कुछ विद्वान अजमेर और सांभर राजा विग्रह राज चतुर्थ को इसका चरित्र नायक मानते हैं, तो कुछ विग्रह राज तृतीय को.           ...

प्रगतिवादी काव्य:--

प्रगति का अर्थ है--आगे बढ़ना. जो साहित्य जीवन को अग्रसर करने मे सहायक हो वह प्रगतिशील साहित्य है. इस दृष्टि से तुलसी दास अधिक प्रगति वादी  हैं. भारतेन्दु और द्विवेदी युग के लेखक गुप्त जी इसी अर्थ में प्रगतिशील लेखक हैं. लेकिन आज के विद्वान इनमें से किसी को प्रगतिवादी नहीं मानते.उनके अनुसार ये सभी प्रतिक्रिया वादी लेखक हैं. अत:प्रगति का अर्थ एक विशेष दिशा में आगे बढ़ना है. इसकी एक विशेष परिभाषा है जिसका आधार द्वन्द्वात्मक भौतिक वाद है.                       भौतिक वाद का अर्थ है- संसार का मूल आधार पदार्थ है. विश्व में केवल एक सत्ता है -- -आधिभौतिक. आध्यात्मिक और आधिदैविक सत्ता छल मात्र है. संसार का निर्माण कोई दैवीय सत्ता का परिणाम नहीं है और न ही किसी विशेष मानव द्वारा सृजित. यह गतिशील पदार्थ की जीवित अग्नि शिखा है जो ऊर्ध्व विकास और अध:पतन की ओर उन्मुख है. गति की इन विरोधी शक्तियों के संघर्ष और द्वन्द्व का अध्ययन करना ही द्वंद्वात्मक भौतिक वाद है.इन विरोधी शक्तियों में एक विकास के पथ पर और दूसरी विनाश के पथ पर है. चेतन मनुष्य क...

सरोज-स्मृति में निराला के अनुभव एवं शिल्प की व्याख्या कीजिये.

'सरोज-स्मृति' निराला का प्रसिद्ध शोक गीत है. अपनी पुत्री के आसमयिक निधन पर निराला ने शोक- संतप्त ह्रदय की विह्वल भावनाओं को इस रचना में वाणी दी है, अल्पायु में ही सरोज की मृत्यु ने निराला के ह्रदय को आहत कर दिया.इस कविता के भाव और शिल्प का गठन कविता को श्रेष्ठ गीतों में स्थान दिलाता है.इस गीत का मूल भाव अपने प्रिय जन के मृत्यु पर यह एक प्रकार का हृदय श्रद्धा व्यक्त करता है शोक एक प्रकार का ऐसा मनोभाव है जिसमें प्रगाढ़ राग, अनुरक्ति की पीड़ा भी मिश्रित रहती है यह शोक मर्म पीड़ा का परिचायक होता है.                           'सरोज-स्मृति' में शैली की भावुकता, मिश्रित आक्रोश, भावना का क्षुब्धता तो है ही किन्तु वह आत्मरक्षा भी है, अपनी विवशता और समाज की क्रूरता मिश्रित मिलता के संदर्भ से ही है. निराला के इस शोक गीत का आलंबन उनकी पुत्री सरोज है जिसका देहांत सवा अठारह वर्ष की आयु में हो गया था. विषम परिस्थितियों के शिकार निराला के लिए उसका देहांत काफी कष्ट दायक सिद्ध हुआ और बेटी की मृत्यु ने फिर क्या निराला को पूरी तरीके से झकझोर...

आंसू :--- प्रतिपाद्य

जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्य के जनक होने के कारण आधुनिक काव्य धारा के गौरव मय प्रति निधि कवि हैं. प्रसाद जी के कोमल कल्पना ने प्रेम के स्वरूप को उपस्थित करते हुए मधुर और कोमल भावनाओं से कविता का श्रृंगार किया . इस प्रकार प्रसाद प्रेम और सौन्दर्य के कवि हैं. प्रेम उनके काव्य शरीर में आत्मा की तरह व्याप्त है.'आंसू' प्रेम की मधुर स्मृति यों को अभिव्यंजित करने वाला जयशंकर प्रसाद कृत प्रसिद्ध काव्य है.              'आंसू' एक लंबा प्रतीकात्मक काव्य है.यह एक उच्छवास पूर्ण प्रेम काव्य भी है, जिसमें प्रेयसी के वियोग में प्रेमी के आंखों से गिरे हुए आंसूओं का संकलन है. इसमें कवि मुख्यतः श्रृंगारिक भावों की अभिव्यक्ति दी है. इसमें श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का अत्यंत उत्कृष्ट वर्णन हुआ है. मधुर दिनों की स्मृति कर कवि संयोग श्रृंगार का वर्णन करता है.                  'आंसू' के प्रारंभ में ही कवि कहता है कि उसका समस्त सुख नष्ट हो गया है और अब स्मृति शेष है. वह अपने सुखमय अतीत जीवन का स्मरण कर अपनी वेदना का वि...

आंसू ( काव्य) :---- विशेषता

जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्य के जनक होने के कारण आधुनिक काव्य धारा के गौरवमय प्रतिनिधि कवि हैं. प्रसाद जी की कोमल कल्पना ने प्रेम के स्वरुप को उपस्थित करते हुए मधुर और कोमल भावनाओं से कविता को श्रृंगार किया . इस प्रकार, प्रसाद प्रेम एवं सौन्दर्य के कवि हैं. प्रेम उनके काव्य शरीर में आत्मा की तरह व्याप्त है. 'आंसू प्रेम की मधुर स्मृतियों को अभिव्यंजना करने वाला जयशंकर प्रसाद कृत प्रसिद्ध काव्य है, जिसमें प्रेयसी के वियोग में प्रेमी के आंखों से गिरे हुए आंसूओं का संकलन है.                        'आंसू' में प्रेयसी के नख -शिखर वर्णन में श्रृंगार का परिष्कृत चित्र है. कवि अपने अनुभव के आधार पर 'आंसू' की नारी का निर्माण किया है. उसमें रुप- सौन्दर्य सबकुछ है, जिस पर प्रेमी आकृष्ट हुआ. यह नारी सम्पूर्ण मादकता को लेकर भी केवल वासना का प्रतीक बनकर नहीं रहती. यह कई गुणों से परिपूर्ण है. प्रसाद ने प्रेयसी के शरीर में 'पावनता' का आरोप करते हुए उसमें मधुर आलोक की व्यंजना भी की है. प्रसाद ने नारी को प्रेरणा के रूप में ग्रहण किया. आंसू की प्र...

महादेवी वर्मा के गीतिकाव्य की विशेषता:--

सजल गीतों की गायिका महादेवी वर्मा आधुनिक युग की मीरा कही जाती है. इनकी कविता संगीत- कला, चित्र कला, एवं काव्य कला का अपूर्व समन्वय है. गीति-  कला की दृष्टि से महादेवी वर्मा का काव्य उत्कृष्ट उदाहरण है.              महादेवी के गीतिकाव्य की कुछ अपनी मौलिक विशेषताएं हैं. छाया वाद में जिस गीतिकाव्य की रचना एवं बिंब तथा प्रतीक के विधान की शुरुआत हुई थी, महादेवी की रचनाओं में उसने परिपक्व रुप अख्तियार कर लिया. छायावाद की अन्तर्मुखी प्रवृत्ति महादेवी में रहस्य अनुभूति में परिणत हो गयी है. उन्होंने अमूर्त संवेदना को प्रकृति से ग्रहण किये गए बिम्बों एवं प्रतीकों  के माध्यम से मूर्त रुप प्रदान किया है. महादेवी ने गीतिकाव्य के लिए शब्दों और स्वर साधना में संयम के साथ भावातिरेक अथवा अनुभूति की तीव्रता के प्रकाशन को आवश्यक माना है. उनकी कविताओं में अनुभूति की तीव्रता द्रष्टव्य है.                  महादेवी के काव्य में किसी रहस्य वादी विचार- पद्धति के अनुसार सरणिबद्ध भावभूमि नहीं है. इनके गीतिकाव्य की विशिष्ट भा...

माखन लाल चतुर्वेदी : राष्ट्रीय चेतना

कविवर माखनलाल चतुर्वेदी की सबसे बड़ी विशिष्टता है- उनकी कविताओं का राष्ट्रीयता एवं राष्ट्र भक्ति की चेतना से ओतप्रोत होना. वे राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित थे. अत: इन्होंने अपनी कविताओं में सामाजिक यथार्थ को सजीव रूप में प्रतिबिंबित किया . ये अपनी कविताओं में देश- प्रेम, भाव-प्रेम, मधुर और प्रेरक चेतना का संचार करनेवाले अन्यतम सांस्कृतिक मानवतावादी स्वरूप को लेकर अवतरित होते हैं. इनकी राष्ट्रीयता व्यापक और उदात्त होती हुई भी मुख्यतः भावात्मक रही और आदर्शमय रही.                       चतुर्वेदी जी को भारतीय राष्ट्रीयता का प्रेरक कहा जाता है. इनकी कविताएँ कला, भावना व जोश का एक साथ साक्षात्कार कराती है. इनके काव्य में अनेक ऐसे स्थल हैं, जहाँ राष्ट्रीयता कूट कर भरी मिलती है. इनकी भक्ति परक रचनाएँ भी राष्ट्रोन्मुख हो जाती है, तथा इनके यहाँ प्रेम की परिणति भी राष्ट्रप्रेम में ही होती है.इस प्रकार इनकी रचनाओं में प्रेम, प्रकृति, भक्ति सब कुछ आगे चलकर राष्ट्रीयता में समाहित हो जाती है. वे कहते हैं--- " मैं बलि का गान सुनाती ...

भारत-भारती :विशेषता

राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त गांधी युग के प्रतिनिधि कवि हैं. गांधीवादी दृष्टि, नैतिक आग्रह एवं सुधारवादी भावों से उनकी रचनाएँ लवरेज है. इनका स्थान भारतीय संस्कृति के उद्गायकों में सर्वोपरि है. अपनी महत्वपूर्ण कृति 'भारत- भारती' गुप्त जी की कृति को प्रसारित करने वाली राष्ट्रीय भावधारा की प्रमुख कृति है.                       गुप्त जी कृत 'भारत- भारती' उनकी मूल संकल्पनाओं को अभिव्यक्त करती है. यह शिक्षा प्रद कविता का अच्छा उदाहरण है. इसकी मुख्य विषयवस्तु है-- भारत के अतीत का गुणगान करते हुए उसके वर्तमान और भविष्य  को सुदृढ़ करने का प्रयास करना.   'भारत- भारती' का रचना काल 1912-1914 ई० है, इस समय भारत अंग्रेजी परतंत्रता से ग्रस्त था. यही कारण है कि गुप्त जी परतंत्रता से मुक्ति के लिए भारत वर्ष की सांस्कृतिक धरोहर का गुणगान करते हैं. वे भारतीयों के अस्तित्व की रक्षा के लिए जागरण का संदेश देते हुए कहते हैं-- "हम कौन थे, क्या हो गयें हैं, और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएं सभी"        ...

निराला: साहित्यिक परिचय

मुक्त छंद  के मसीहा, प्रगति वाद के अग्रदूत, छायावाद के आधार स्तंभ प्रयोगवाद के बीजारोपण करने वाले महाप्राण 'निराला' व्यवहार में यथार्थवादी, साहित्य चेतना में ज्ञानवादी, दार्शनिक रुप में नव वेदांती और जीवन में मानवतावादी थे. वे एक ऐसे स्रष्टा एवं जीवन द्रष्टा कवि हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य में नए आयाम स्थापित किये. उनके काव्य में जितना आनंद का अमृत है उतना ही वेदना एवं विषमता का विष है. काव्य शिल्प की दृष्टि से आधुनिक हिंदी के कवि गुरु सूर्य कांत त्रिपाठी निराला को अपनी साफगोई अदम्य साहस के कारण समीक्षकों ने उन्हें 'छायावाद का कबीर' कहा है.                         निराला का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषासुर नामक रियासत में सन् 1896 ई०में बसंत पंचमी के दिन हुआ था. काव्य लेखन की अभिरुचि इनमें बचपन से ही थी. प्रारंभ में ही बंगला एवं संस्कृत में कविताएँ करते थे. खडी़ बोली को काव्य भाषा बनने एवं कई कवियों द्वारा रचना रत होने के कारण निराला हिन्दी में कविता करना आरंभ किया.             ...

कबीर के काव्य का सामाजिक पक्ष:--

कबीर का अवतरण वैसे काल में हुआ था, जब समाज में सामाजिक और धार्मिक दुरावस्था अपने चरमोत्कर्ष पर थी. तत्कालीन धार्मिक जीवन आडंबर युक्त था. मानव जीवन का मूल उद्देश्य मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति थी. मानव का मूल लक्ष्य जन्म और मरण से मुक्त होना रह गया था. परिणामतः मानव जीवन में समाजिकता की भावना समाप्त हो गयी थी. सामुहिकता की संकल्पना विकसित न होने के पीछे यह प्रवृत्ति मूल में थी.                               कबीर और तत्कालीन संतों के विषय में अध्ययन करने पर एक बात स्पष्ट रुपेण दृष्टि गत होती है कि राजनीति में धन की प्रधानता उस समय तक स्थापित नहीं हुई थी और कहीं राजनीति थी भी तो वह धार्मिक थी. तत्कालीन समाज में जितनी विषमताओं के ऊंच- नीच के दर्शन होते हैं वे उस समय के धर्म द्वारा ही प्रेरित है. यूँ तो 'धर्म' शब्द काफी व्यापक रहा है लेकिन कबीर के समय वह संकुचित हो चूका था. हिन्दू धर्म ग्रंथों में कर्तव्य पालन करने को धर्म कहा गया है लेकिन उस समय के मानवों में कर्तव्यनिष्ठा की घोर  कमी आ गई थी. ऐसी बात नहीं है कि...

विद्यापति के जीवन वृत , और काव्यगत विशेषताएं---

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हिन्दी साहित्य के आदिकालीन कवियों में विद्यापति का नाम महत्वपूर्ण है. इन्होंने हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा और नई दशा प्रदान की. हिन्दी साहित्य के इस महान कवि का जन्म कब हुआ था, यह विवाद का विषय है लेकिन आलोचकों का मानना है कि सन् 1350 से सन् 1450 के मध्य वर्तमान थे. इनका जन्म दरभंगा जिले के बिस्फी नामक गाँव में एक सुशिक्षित ब्राह्मण परिवार में हुआ था. पिता तिरहुत राज्य घराने में पुरोहित के पद पर आसीन थे. इस कारण राजसभा में इनका आना -जाना लगा रहता था. इसका प्रत्यक्ष लाभ जीवन काल में प्राप्त हुआ. तिरहुत नरेश शिव सिंह से इनकी अभिन्न मित्रता थी. अपनी रचनाओं में बारंबार शिव सिंह और रानी लखिमा देवी का उल्लेख किया है. राजा शिव सिंह अपने राज्याभिषेक के समय बिस्फी ग्राम उपहार स्वरूप प्रदान किया था. बिस्फी से प्राप्त एक ताम्र पत्र में 'अभिनव जयदेव' शब्द इनके  लिए उल्लेखित है, अर्थात जयदेव के समान  कृष्ण भक्त. विद्यापति आजीवन राजा शिव सिंह के साथ रहें, उनकी मृत्यु के उपरांत भी उनके यादों में काव्य रचना जारी रखा. अपने अंत समय में गंगा तट पर प्राण त्याग किये.         ...