विद्यापति के जीवन वृत , और काव्यगत विशेषताएं---
हिन्दी साहित्य के आदिकालीन कवियों में विद्यापति का नाम महत्वपूर्ण है. इन्होंने हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा और नई दशा प्रदान की. हिन्दी साहित्य के इस महान कवि का जन्म कब हुआ था, यह विवाद का विषय है लेकिन आलोचकों का मानना है कि सन् 1350 से सन् 1450 के मध्य वर्तमान थे. इनका जन्म दरभंगा जिले के बिस्फी नामक गाँव में एक सुशिक्षित ब्राह्मण परिवार में हुआ था. पिता तिरहुत राज्य घराने में पुरोहित के पद पर आसीन थे. इस कारण राजसभा में इनका आना -जाना लगा रहता था. इसका प्रत्यक्ष लाभ जीवन काल में प्राप्त हुआ. तिरहुत नरेश शिव सिंह से इनकी अभिन्न मित्रता थी. अपनी रचनाओं में बारंबार शिव सिंह और रानी लखिमा देवी का उल्लेख किया है. राजा शिव सिंह अपने राज्याभिषेक के समय बिस्फी ग्राम उपहार स्वरूप प्रदान किया था. बिस्फी से प्राप्त एक ताम्र पत्र में 'अभिनव जयदेव' शब्द इनके लिए उल्लेखित है, अर्थात जयदेव के समान कृष्ण भक्त. विद्यापति आजीवन राजा शिव सिंह के साथ रहें, उनकी मृत्यु के उपरांत भी उनके यादों में काव्य रचना जारी रखा. अपने अंत समय में गंगा तट पर प्राण त्याग किये.
ये मुलत: तीन भाषाओं में संस्कृत, अवहट्ठ और मैथिली में काव्य रचना की. शैव सर्वस्वसार, दुर्गा भक्ततरंगिनी, भूपरिकर्मा, पुरुष परीक्षा, लिखनावली गंगा वाक्यावली , विभाग सागर, गया पत्तलक एवं वर्ष कृत्य संस्कृत की रचना है वही ंं कृति लता व कृति पताका अवहट्ठ की और पदावली' लोकभाषा मैथिल में रचित है.
काव्य गत विशेषताएं--- कवि विद्यापति का कुल शिव का उपासक था इस कारण इनकी रचनाओं में यह प्रभाव स्पष्ट रुपेण दृष्टि गत होता है. दरभंगा बंगाल के नजदीक है इस कारण शाक्त प्रभाव से भी यह वंचित नहीं रह पाऐं. अपनी रचनाओं में देवी के काली रूप की स्तुति की है--" जय जय भैरवि असुर- भयानक, पसु-पति भामिनी माया " अपने दुःख के निवारण हेतु भोले नाथ से भी प्रार्थना करते हैं "कखन हरव दुःख मोर हे भोले नाथ"
कृष्ण का रूप वर्णन करते समय उनकी वाणी अवरुद्ध हो जाती है "माधव कत तोर करब बड़ाई"
शिव और विष्णु दोनों के प्रति भक्ति के कारण दोनों को एक ही मानते हैं " भल हरि भल हर भल तुव कला,
खन पित वसन खनहि बघछला."
विद्यापति की संस्कृत रचनाएँ धार्मिक और सांस्कृतिक है. अवहट्ठ की रचनाओं में 'कृतिलता'और 'कृति पताका' प्रशस्ति गान है. जीवन के उत्तरार्ध में दुर्गा, गंगा और शिव की स्तुति करना प्रारंभ कर दिया था. उनकी कालजयी रचना और समस्त उपलब्धि का आधार मैथिली भाषा में रचित 'पदावली' है. इसमें श्रृंगार वर्णन अनूठा है. राधा और कृष्ण को केन्द्र मे ं रखकर अनेकों रचनाएँ की गई है. श्रृंगार वर्णन कहीं भी बोझिल नहीं लगता. ये भी विद्यापति की महत्वपूर्ण काव्यगत विशेषता है. देशी भाषा में रचित होने के कारण आलोचकों ने इसे 'देसिल बयना' कह कर संबोधित किया है. देशी भाषा में रचित होने के कारण आज भी मिथिला प्रदेश में आज भी कंठों में सुरक्षित है. लोकप्रियता का आधार इससे भी लगाया जा सकता है कि बंगाल में भ 'पदावली' के पद प्रेम से गाया जाता है.
विद्यापति के पदों में मार्मिकताऔर प्रौढ़ता है. उसमें भक्ति एवं श्रृंगार का रस प्रवाह है. श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग को उचित तरिके से सजाया गया है. 'पदावली' में कवि भावों को पूरी मधुरता और गेयता के साथ व्यंजित किया है.यह लोकभाषा की श्रेष्ठ साहित्यिक रचना है. इसमें तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों की प्रचुरता है. भाषा में माधुर्य और प्रसाद गुण का समावेश है.
निष्कर्ष-- विद्यापति अपने युग के लोकप्रिय तथा सफल कवि थे. कवि की कला ने अपने भाव सौन्दर्य को अपनी पूरी मधुरता और गेयता से व्यंजित किया है. रचना पद्धति की दृष्टि से विद्यापति की रचनाएँ गीतिकाव्य के अन्तर्गत आती है. इनके पद मिथिला के सांस्कृतिक धरोहर के साथ- साथ हिन्दी साहित्य के इतिहास के आदिकालीन स्तंभ भी है.🌷🌷🌷🌷
गौरव मिश्रा
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