दरबारी संस्कृति और रीति काव्य
रीतिकाल का आरंभ जहांगीर के शासनकाल के उत्तरार्ध से होता है। मुगल दरबार में फारसी कला एवं काव्य परंपराओं का प्रश्रय प्राप्त हुआ। राजस्थान के नरेश और सामंतों की छत्रछाया में हिंदी कविता का दरबारी रूप पनपा। ओरछा,कोटा, बूंदी ,जयपुर, जोधपुर और महाराष्ट्र के राज दरबारों में प्रदर्शन प्रधान श्रृंगार पूर्ण जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति करने वाली काव्यधारा चलती रही। साहित्य और कला की दृष्टि से रीतिकाल को पर्याप्त समृद्ध कहा जा सकता है। इस काल के कवि और कलाकार साधारण वर्ग के थे फिर भी अपने आश्रय दाता मुगल सम्राटों अथवा देसी राज नवाबों से उन्हें इतना सम्मान मिलता था की समाज के प्रतिष्ठित लोगों में उनकी गणना होती थी और इसी सम्मान और पश्रय के कारण इन लोगों ने अपनी कला का गुण और परिणाम दोनों दृष्टि से अधिकाधिक विकास किया। लेकिन उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त न थी जो सर्जन के लिए अनिवार्य है। उन्हें अन्नदाता की अभिरुचि का विशेष ध्यान देना पड़ता था। इसलिए प्रतिभावान होते हुए भी वे अपने सर्जन का उत्कृष्ट रूप प्रदान करने में असमर्थ रहे। ...