Posts

दरबारी संस्कृति और रीति काव्य

रीतिकाल का आरंभ जहांगीर के शासनकाल के उत्तरार्ध से होता है। मुगल दरबार में फारसी कला एवं काव्य परंपराओं का प्रश्रय प्राप्त हुआ। राजस्थान के नरेश और सामंतों की छत्रछाया में हिंदी कविता का दरबारी रूप पनपा। ओरछा,कोटा, बूंदी ,जयपुर, जोधपुर और महाराष्ट्र के राज दरबारों में प्रदर्शन प्रधान श्रृंगार पूर्ण जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति करने वाली काव्यधारा चलती रही।                 साहित्य और कला की दृष्टि से रीतिकाल को  पर्याप्त समृद्ध कहा जा सकता है। इस काल के कवि और कलाकार साधारण वर्ग के थे फिर भी अपने आश्रय दाता मुगल सम्राटों अथवा देसी राज नवाबों से उन्हें इतना सम्मान मिलता था की समाज के प्रतिष्ठित लोगों में उनकी गणना होती थी और इसी सम्मान और पश्रय के कारण इन लोगों ने अपनी कला का गुण और परिणाम दोनों दृष्टि से अधिकाधिक विकास किया। लेकिन उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त न थी जो सर्जन के लिए अनिवार्य है। उन्हें अन्नदाता की अभिरुचि का विशेष ध्यान देना पड़ता था। इसलिए प्रतिभावान होते हुए भी वे अपने सर्जन का उत्कृष्ट रूप प्रदान करने में असमर्थ रहे।   ...

प्रेमचंद की प्रासंगिकता

प्रेमचंद की पहली महत्वपूर्ण कहानी 'पंचपरमेश्वर' रही है. प्रेमचंद कहानी और उपन्यास की रचना में अपनी महारथ सिद्ध की. उससे समालोचकों के मध्य यह समस्या उत्पन्न होती है कि प्रेमचंद को उपन्यासकार के रूप में माना जाए या कहानी कार के रूप में. डाक्टर रामविलास शर्मा ने हिन्दी साहित्य में उपन्यासकार प्रेमचंद के अस्तित्व को स्वीकार किया है. लेकिन फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रेमचंद ने हिंदी कथा साहित्य को किस्सागोई से रचना के स्तर पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में लोक कथा के तत्वों का प्रयोग किया और जीवन के यथार्थ को कला के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके पूर्व हिंदी कथाकारों ने जीवन को समस्याओं के रूप में देखा  लेकिन प्रेमचंद ने जीवन के समक्ष समस्याओं को देख परख कर उन्हें घटित होते प्रस्तुत किया । सामयिक स्थितियों राजनीतिक चेतना राष्ट्रीय भावना एवं सांस्कृतिक जागरण के प्रनेता दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी के सामाजिक दृष्टिकोण से प्रेरित हो प्रेमचंद सामाजिक जीवन से जुड़े। प्रेमचंद ने भारतीय समाज से तादात्म्य स्थापित किया। सामाजिक जीवन के आधार पर रचना करने के कार...

आदिकाल की प्रमुख प्रवृतियाँ

हिन्दी साहित्य के ग्यारहवीं सदी से चौदहवीं सदुपयोग तक के समय को आदिकाल या वीरगाथा काल कहा जाता है. आदिकाल के नामाकरण के संबंध में विद्वानों में मतैक्य नहीं है.  सर्वप्रथम मिश्रबंधुओं ने अपने मिश्रबंधु विनोद में हिन्दी साहित्य के इस काल को 'आदिकाल' या 'रासोकाल' कहा. आदिकाल नाम तो तर्क संगत लगता है लेकिन रासो काल नाम उचित नहीं लगता है. क्योंकि रासो काव्य के अतिरिक्त और भी काव्यगत रचनाएँ इस काल में की जा रही थी.                       रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल कहा है. लेकिन विद्वानों को इस  पर भी आपत्ति है.  क्योंकि वीरगाथात्मक रचनाओं के अतिरिक्त भक्तिपरक, आध्यात्मिक और उपदेश परक रचनाएँ इस काल की सौन्दर्य बढ़ा रही थी. इसलिए आचार्य शुक्ल द्वारा प्रतिपादित यह नाम भी सुसंगत प्रतीत नहीं होता.             चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने आदिकाल को अपभ्रंश काल कह कर संबोधित किया है. यह नामाकरण अपभ्रंश भाषा के आधार पर किया गया है. अपभ्रंश एक स्वतंत्र भाषा है. इसलिए यह नाम भी औचित्य हीन है. सांकृत्याय...

'आदिकाल' टिप्पणी

1000 ई. से 1400ई. तक के काल को रामचंद्र शुक्ल ने आदिकाल कहा है.      आदिकाल में अपभ्रंश डिंगल के अलावा खडी़ बोली और मैथिली में रचनाएँ हुई. खडी़ बोली का रूप अमीर खुसरो की रचनाओं में मिलता है. मैथिली बिहार की मैथिल  जनपद में बोली जाती है और यह हिन्दी की विभाषा मानी जाती है. विद्यापति की पदावली हिन्दी की अमूल्य निधि मानी जाती है. इस काल के अनेक रचयिता राजाओं के आश्रय में रहते थे. इसलिए परिस्थिति वश उन्हें राजाओं के गुणगान करना पड़ता था. उनकी वीरता का वर्णन करना पड़ता था.  चंदबरदाई ने  ' पृथ्वी राज रासो' में पृथ्वी राज के शौर्य का वर्णन किया है. चूंकि इस काल में स्त्रियों का अपहरण होता था इसलिए इसे श्रृंगार का  भी वर्णन हुआ है. 🌷🌷                           गौरव मिश्रा       

रीति काल और आलंकारिकता

रीति काल भाषा का अलंकृत काल है. भक्ति काल में तुलसी, जायसी, सूर जैसे सशक्त भक्त कवियों के हाथों जो भाषा प्रौढ़ता की चरम सीमा प्राप्त कर चुकी थी वह रीति काल तक आते- आते स्वभावत: अलंकरण की ओर झुकने लगी. रीति कालीन कविता की दूसरी प्रवृत्ति अलंकारिता है. इस युग में प्रदर्शन चमत्कार और रसिकता को प्रधानता दी गयी. कविता का प्रमुख विषय श्रृंगार ही है पर रूप आकार की सजावट के लिए अलंकार को अपनाया गया. संस्कृत साहित्य के अलंकार शास्त्र का गंभीर अध्धयन कर लक्षण ज्यों के त्यों उतारे गए, परन्तु उदाहरण अपने मनोनुकूल लिखे गए. अलंकार शास्त्र के ज्ञान हुए बिना कवि होना असंभव समझा जाता था. श्रृंगार के संयोग और वियोग दशाओं का वर्णन आलंकारिक ढंग से किया गया.   " जद्यपि सुजाति सुलच्छनी सुबरन सरस सुवृत.     भूषण बिनु न बिराज ई कवित बनिता मित्त." उपर्युक्त अलंकरण के प्राधान्य को देखकर मिश्र बंधुओं ने इस काल को अलंकृत काल रखा.                कविता और अलंकार का घनिष्ठ संबंध है. रीति काल के कवियों ने सचेत होकर यत्नपूर्वक अपनी वाणी को अलंकृत किया. उनके लिए कवि...

रीति काल का श्रृंगार पक्ष

रीति काव्य की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति उसकी श्रृंगारिक रही है. नैतिक आदर्शों की छूट के कारण कामवृति की अभिव्यक्ति के लिए पूर्ण स्वछंदता थी. श्रृंगार भावना के दमन के कारण उनकी श्रृगांरिकता उभरी, ऐसी बात नहीं थी, बल्कि शारीरिक सुख की प्राप्ति के लिए समस्त विलास के उपकरणों को एकत्रित करने में उनका ध्यान केंद्रित रहा. संयोग के नग्न चित्रों में नायिका के धृष्टता के विभिन्न रूपों का प्रस्तुत करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं किया. क्योंकि इस प्रवृत्ति में विलासिता का प्राधान्य है. एक ओर बिहारी जैसे सूक्ष्मदर्शी कवि की निगाह सौन्दर्य के बारीक संकेत को पकड़ सकती थी. दूसरी ओर मतिराम, देव, घनानंद, पद्माकर जैसे रस सिद्ध कवि ऐंद्रिक आनंद का पान करके उत्सव मनाने लगे.                  काव्य के क्षेत्र में बारहवीं शताब्दी में जयदेव ने नायक नायिका के रूप में राधा- कृष्ण के श्रृंगार का वर्णन किया. हिन्दी में सर्वप्रथम विद्यापति ने इस परंपरा को अपनाया. इसके बाद राधाकृष्ण विषयक श्रृंगारी साहित्य का विकास हुआ. रीति काल में पहुँच कर लौकिक श्रृंगार की प्रधानता हो ...

छायावाद और रहस्यवाद

छायावादी काव्य का प्रवर्तन जयशंकर प्रसाद की रचनाओं से हुआ. निराला की जुही की कली(1916) और पंत ने पल्लव(1920) की रचनाओं के साथ स्थायित्व प्रदान किया. प्रसाद की मृत्यु तथा और पंत और निराला के प्रगतिवाद कीओर रूझान होने से छायावाद का अवसान हो गया. इसलिए छायावाद का कार्य काल 1918 से 1936तक माना जाता है.                           छायावाद की परिभाषा के संबंध में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है किसी कविता के भावों की छाया यदि कहीं अन्यत्र पडे तो उसे छायावादी कविता कहना चाहिए. डाक्टर नागेन्द्र ने छायावाद को स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह कहा है. नंददुलारे वाजपेयी ने कहा है मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म किन्तु व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान छायावाद की सर्वमान्य व्याख्या है. नंददुलारे वाजपेयी ने जिसे छायावाद नाम दिया है उसी को रामचंद्र शुक्ल ने रहस्यवाद कहा है. शुक्ल के अनुसार चिंतन के क्षेत्रों में अद्वैत वाद है, वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है.                ...