रीति काल का श्रृंगार पक्ष
रीति काव्य की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति उसकी श्रृंगारिक रही है. नैतिक आदर्शों की छूट के कारण कामवृति की अभिव्यक्ति के लिए पूर्ण स्वछंदता थी. श्रृंगार भावना के दमन के कारण उनकी श्रृगांरिकता उभरी, ऐसी बात नहीं थी, बल्कि शारीरिक सुख की प्राप्ति के लिए समस्त विलास के उपकरणों को एकत्रित करने में उनका ध्यान केंद्रित रहा. संयोग के नग्न चित्रों में नायिका के धृष्टता के विभिन्न रूपों का प्रस्तुत करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं किया. क्योंकि इस प्रवृत्ति में विलासिता का प्राधान्य है. एक ओर बिहारी जैसे सूक्ष्मदर्शी कवि की निगाह सौन्दर्य के बारीक संकेत को पकड़ सकती थी. दूसरी ओर मतिराम, देव, घनानंद, पद्माकर जैसे रस सिद्ध कवि ऐंद्रिक आनंद का पान करके उत्सव मनाने लगे.
काव्य के क्षेत्र में बारहवीं शताब्दी में जयदेव ने नायक नायिका के रूप में राधा- कृष्ण के श्रृंगार का वर्णन किया. हिन्दी में सर्वप्रथम विद्यापति ने इस परंपरा को अपनाया. इसके बाद राधाकृष्ण विषयक श्रृंगारी साहित्य का विकास हुआ. रीति काल में पहुँच कर लौकिक श्रृंगार की प्रधानता हो गई.
बिहारी ने श्रृंगार रस के समस्त पक्षों आयोग संयोग और वियोग का निरूपण ध्वनि के माध्यम से अत्यंत सरस और मार्मिक किया है. बिहारी ने नायिका की क्रिया विदग्धता का जो वर्णन किया है वह दर्शनीय है. उनकी शारीरिक क्रियाएँ एवं मनोभाव परस्पर संबंध हैं. "चितई ललचौं हैं चखना, डटि घूंघट- पट मांह.
छलसौं चली छुवाईकै, छिनकु छबीली छांव."
लेकिन इनका विरह वर्णन प्रायः ऊहात्मक है. मार्मिकता कम है. लेकिन ऐसे स्थल बहुत कम हैं. संयोग श्रृंगार क ई स्थलों पर अश्लील हो ग ए हैं. श्रृंगार रस में विप्रलंभ श्रृंगार की प्रधानता है. नायिका भेद का विवेचन अत्यंत विस्तार के साथ किया गया है.
नारी के प्रति इन कवियों की दृष्टि सामंती रही है. वे नारी को पुरुष की अर्धांग न समझ कर उसे भोग का मात्र उपकरण समझते थे. फिर भी उनमें गार्हस्थ्य प्रेम की व्यापक स्वीकृति देखने को मिलती है.
मतिराम ने स्वीकार प्रेम की स्थापना की है. साथ ही साथ सामान्य प्रेम का वर्णन इन लोगों ने किया है. रीति काल में भारतीय श्रृंगार परंपरा का स्वभाविक विकास हुआ है. उस पर वाह्य प्रभाव पड़ा है लेकिन उसके मूल तत्व सदा भारतीय रहे हैं.
रीति काल के पुरुष को नारी- विशेष की वैयक्तिक सत्ता से प्रेम नहीं था, बल्कि उसके नारीत्व से प्रेम था.
निष्कर्षत: कहा जा सकता है रीति काल का मूलाधार रसिकता है, पर. प्रेम नहीं. यह रसिक शुद्ध और ऐन्द्रिक है, उपभोग प्रधान है. वासना को प्राकृतिक रूप में ग्रहण कर उसकी संतुष्टि को प्रेम रूप में स्वी कार किया गया है. उसको न आध्यात्मिक रूप देने का प्रयत्न किया गया है न उदात्त और परिष्कृत करने का. यह श्रृंगार उपभोग प्रधान एवं गार्हस्थ्य है.यह बाजारी इश्क़ या दरबारी वैश्या विलास से भिन्न है.🌷🌷🌷🌷
गौरव मिश्रा
(स्रोत- हिन्दी भाषा व साहित्य, रामबुझावन व विदुर)
Comments
Post a Comment