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Showing posts from March, 2021

दरबारी संस्कृति और रीति काव्य

रीतिकाल का आरंभ जहांगीर के शासनकाल के उत्तरार्ध से होता है। मुगल दरबार में फारसी कला एवं काव्य परंपराओं का प्रश्रय प्राप्त हुआ। राजस्थान के नरेश और सामंतों की छत्रछाया में हिंदी कविता का दरबारी रूप पनपा। ओरछा,कोटा, बूंदी ,जयपुर, जोधपुर और महाराष्ट्र के राज दरबारों में प्रदर्शन प्रधान श्रृंगार पूर्ण जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति करने वाली काव्यधारा चलती रही।                 साहित्य और कला की दृष्टि से रीतिकाल को  पर्याप्त समृद्ध कहा जा सकता है। इस काल के कवि और कलाकार साधारण वर्ग के थे फिर भी अपने आश्रय दाता मुगल सम्राटों अथवा देसी राज नवाबों से उन्हें इतना सम्मान मिलता था की समाज के प्रतिष्ठित लोगों में उनकी गणना होती थी और इसी सम्मान और पश्रय के कारण इन लोगों ने अपनी कला का गुण और परिणाम दोनों दृष्टि से अधिकाधिक विकास किया। लेकिन उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त न थी जो सर्जन के लिए अनिवार्य है। उन्हें अन्नदाता की अभिरुचि का विशेष ध्यान देना पड़ता था। इसलिए प्रतिभावान होते हुए भी वे अपने सर्जन का उत्कृष्ट रूप प्रदान करने में असमर्थ रहे।   ...

प्रेमचंद की प्रासंगिकता

प्रेमचंद की पहली महत्वपूर्ण कहानी 'पंचपरमेश्वर' रही है. प्रेमचंद कहानी और उपन्यास की रचना में अपनी महारथ सिद्ध की. उससे समालोचकों के मध्य यह समस्या उत्पन्न होती है कि प्रेमचंद को उपन्यासकार के रूप में माना जाए या कहानी कार के रूप में. डाक्टर रामविलास शर्मा ने हिन्दी साहित्य में उपन्यासकार प्रेमचंद के अस्तित्व को स्वीकार किया है. लेकिन फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रेमचंद ने हिंदी कथा साहित्य को किस्सागोई से रचना के स्तर पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में लोक कथा के तत्वों का प्रयोग किया और जीवन के यथार्थ को कला के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके पूर्व हिंदी कथाकारों ने जीवन को समस्याओं के रूप में देखा  लेकिन प्रेमचंद ने जीवन के समक्ष समस्याओं को देख परख कर उन्हें घटित होते प्रस्तुत किया । सामयिक स्थितियों राजनीतिक चेतना राष्ट्रीय भावना एवं सांस्कृतिक जागरण के प्रनेता दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी के सामाजिक दृष्टिकोण से प्रेरित हो प्रेमचंद सामाजिक जीवन से जुड़े। प्रेमचंद ने भारतीय समाज से तादात्म्य स्थापित किया। सामाजिक जीवन के आधार पर रचना करने के कार...