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Showing posts from October, 2020

रीति काल और आलंकारिकता

रीति काल भाषा का अलंकृत काल है. भक्ति काल में तुलसी, जायसी, सूर जैसे सशक्त भक्त कवियों के हाथों जो भाषा प्रौढ़ता की चरम सीमा प्राप्त कर चुकी थी वह रीति काल तक आते- आते स्वभावत: अलंकरण की ओर झुकने लगी. रीति कालीन कविता की दूसरी प्रवृत्ति अलंकारिता है. इस युग में प्रदर्शन चमत्कार और रसिकता को प्रधानता दी गयी. कविता का प्रमुख विषय श्रृंगार ही है पर रूप आकार की सजावट के लिए अलंकार को अपनाया गया. संस्कृत साहित्य के अलंकार शास्त्र का गंभीर अध्धयन कर लक्षण ज्यों के त्यों उतारे गए, परन्तु उदाहरण अपने मनोनुकूल लिखे गए. अलंकार शास्त्र के ज्ञान हुए बिना कवि होना असंभव समझा जाता था. श्रृंगार के संयोग और वियोग दशाओं का वर्णन आलंकारिक ढंग से किया गया.   " जद्यपि सुजाति सुलच्छनी सुबरन सरस सुवृत.     भूषण बिनु न बिराज ई कवित बनिता मित्त." उपर्युक्त अलंकरण के प्राधान्य को देखकर मिश्र बंधुओं ने इस काल को अलंकृत काल रखा.                कविता और अलंकार का घनिष्ठ संबंध है. रीति काल के कवियों ने सचेत होकर यत्नपूर्वक अपनी वाणी को अलंकृत किया. उनके लिए कवि...

रीति काल का श्रृंगार पक्ष

रीति काव्य की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति उसकी श्रृंगारिक रही है. नैतिक आदर्शों की छूट के कारण कामवृति की अभिव्यक्ति के लिए पूर्ण स्वछंदता थी. श्रृंगार भावना के दमन के कारण उनकी श्रृगांरिकता उभरी, ऐसी बात नहीं थी, बल्कि शारीरिक सुख की प्राप्ति के लिए समस्त विलास के उपकरणों को एकत्रित करने में उनका ध्यान केंद्रित रहा. संयोग के नग्न चित्रों में नायिका के धृष्टता के विभिन्न रूपों का प्रस्तुत करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं किया. क्योंकि इस प्रवृत्ति में विलासिता का प्राधान्य है. एक ओर बिहारी जैसे सूक्ष्मदर्शी कवि की निगाह सौन्दर्य के बारीक संकेत को पकड़ सकती थी. दूसरी ओर मतिराम, देव, घनानंद, पद्माकर जैसे रस सिद्ध कवि ऐंद्रिक आनंद का पान करके उत्सव मनाने लगे.                  काव्य के क्षेत्र में बारहवीं शताब्दी में जयदेव ने नायक नायिका के रूप में राधा- कृष्ण के श्रृंगार का वर्णन किया. हिन्दी में सर्वप्रथम विद्यापति ने इस परंपरा को अपनाया. इसके बाद राधाकृष्ण विषयक श्रृंगारी साहित्य का विकास हुआ. रीति काल में पहुँच कर लौकिक श्रृंगार की प्रधानता हो ...

छायावाद और रहस्यवाद

छायावादी काव्य का प्रवर्तन जयशंकर प्रसाद की रचनाओं से हुआ. निराला की जुही की कली(1916) और पंत ने पल्लव(1920) की रचनाओं के साथ स्थायित्व प्रदान किया. प्रसाद की मृत्यु तथा और पंत और निराला के प्रगतिवाद कीओर रूझान होने से छायावाद का अवसान हो गया. इसलिए छायावाद का कार्य काल 1918 से 1936तक माना जाता है.                           छायावाद की परिभाषा के संबंध में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है किसी कविता के भावों की छाया यदि कहीं अन्यत्र पडे तो उसे छायावादी कविता कहना चाहिए. डाक्टर नागेन्द्र ने छायावाद को स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह कहा है. नंददुलारे वाजपेयी ने कहा है मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म किन्तु व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान छायावाद की सर्वमान्य व्याख्या है. नंददुलारे वाजपेयी ने जिसे छायावाद नाम दिया है उसी को रामचंद्र शुक्ल ने रहस्यवाद कहा है. शुक्ल के अनुसार चिंतन के क्षेत्रों में अद्वैत वाद है, वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है.                ...

छायावाद की सौन्दर्य

छायावादी कवियों का काव्य प्राकृतिक और मानवीय सौन्दर्य की भूमि पर अधिष्ठित है. काव्य में प्रकृति चित्रण दो रुपों में किया जाता है--आलंबन और उद्दीपन. प्रकृति के विम्बग्राही स्वरूप के चित्रण में आलंबन का रूप चित्र मिलता है लेकिन प्रकृति का चित्रण जहाँ नायक और नायिकाओं की मनोदशा के अनुकूल किया जाता है, वहाँ उद्दीपन रूप में चित्रण होता है. छायावाद में अधिकांशतः प्रकृति चित्रण उद्दीपन रूप में मिलता है, आलंबन रूप में कम. संयोग में उसका मनोहारी रूप है और वियोग मे दाहकारी. षडत्ऋतु और बारहमासी के रुप में प्रकृति का उद्दीपन चित्र मिलते हैं. प्रसाद ने अपनी आरंभिक कविताओं में प्रकृति की रमणीयता पर मुग्ध हो सौन्दर्य प्रभावों को अंकित किया है. इनकी प्रकृति संबंधी दृष्टि में नवीनता और ताजगी है. वे प्रकृति को जड़ न मानकर चेतन मानते हैं, उस पर चेतना का आरोपन कर मानवीकरण करते हैं. कहीं उनका भाव विस्मय भरा है. प्रसाद रात्रि को नारी मानते हैं.--- "पगली हां संभाल ले कैसे छूट पडा़ तेरा अंचल. देख विखरती है मणिराजी अरी उठा बेसुध चंचल."                 प्रकृति के विभिन्न अ...

छायावादी दर्शन

छायावादी कवियों का काव्य प्रकृति मानवीय सौन्दर्य पर अधारित है. जयशंकर प्रसाद प्रकृति को जड़ न मानकर चेतन माना है. वहीं पंत प्रकृति के विभिन्न अवयवों में ब्रह्म का दर्शन करते हैं. प्रसिद्ध आलोचक डाक्टर नागेन्द्र ने छायावाद को स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह कहा है. नंददुलारे वाजपेयी ने प्रकृति के व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान कहा है. एक अन्य आलोचक शांति प्रिय द्विवेदी ने इन कविताओं में परमात्मा की छाया का भान कहा है.. इसमें अव्यक्त, निर्गुण, निराकार, अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन मानकर चित्र मयी भाषा में प्रेम की अभिव्यंजना की गई है. प्रसाद ने कामायनी में आनंदवाद की सृष्टि प्रत्यभिज्ञा दर्शन के आधार पर की है. वैष्णव कवियों ने आनंद के आलंबन को वाह्य जगत में देखा है लेकिन प्रसाद ने कामायनी में आनंद की अनुभूति आत्मा के भीतर की है. इसके अलावा कामायनी के दार्शनिक सिद्धांतों में समरसता का सिद्धांत, नियतिवाद, प्रत्यभिज्ञा दर्शन का समावेश है. जड़ और चेतन की समरसता पर प्रसाद ने इस पर प्रकाश डाला है --                  "समरसता थे जड़ या...

रीति काल के रीति मुक्त कवि

इस वर्ग के अन्तर्गत वे कवि आतें हैं जिन्होंने साधारण काव्य के रुप में रचना की और जिनकी रचनाओं में श्रृंगार रस विषयक विविध अवयवों का स्वयं समावेश हो गया. सेनापति और घनानंद इसी वर्ग के कवि हैं.                    रीति काल के कवियों की कविता या तो बिहारी की तरह बौद्धिक है या मतिराम की भांति सहज. परन्तु इसी काल के कवियों की कविता भावपूर्ण कविता है. उसमें भाव प्रवणता की प्रधानता है. इनके काव्य में रीति कवियों के समान अलंकारों का बाहुल्यता एवं कृत्रिमता नहीं है. इन कवियों के श्रृंगार वर्णन में विषयों व्यक्ति यों  की मुद्राओं का वर्णन कम है, बल्कि उनके द्वारा हृदय पर पडने वाले प्रभाव का वर्णन अधिक है. इन्होंने भावपक्ष को महत्व दिया है और कला पक्ष की उपेक्षा की है. ये शास्त्र के अनुसार काव्य की रचना करना काव्य के साथ खिलवाड़ मानते थे. ये कवि हृदय की अनुभूति को पूरी सच्चाई के साथ व्यक्त करने वाले कवि थे.               इनके प्रेम का स्वरूप बंधन हिन था. सूरदास आदि भक्त कवियों के समान कृष्ण और गोपियों का स्वछं...