रीति काल और आलंकारिकता
रीति काल भाषा का अलंकृत काल है. भक्ति काल में तुलसी, जायसी, सूर जैसे सशक्त भक्त कवियों के हाथों जो भाषा प्रौढ़ता की चरम सीमा प्राप्त कर चुकी थी वह रीति काल तक आते- आते स्वभावत: अलंकरण की ओर झुकने लगी. रीति कालीन कविता की दूसरी प्रवृत्ति अलंकारिता है. इस युग में प्रदर्शन चमत्कार और रसिकता को प्रधानता दी गयी. कविता का प्रमुख विषय श्रृंगार ही है पर रूप आकार की सजावट के लिए अलंकार को अपनाया गया. संस्कृत साहित्य के अलंकार शास्त्र का गंभीर अध्धयन कर लक्षण ज्यों के त्यों उतारे गए, परन्तु उदाहरण अपने मनोनुकूल लिखे गए. अलंकार शास्त्र के ज्ञान हुए बिना कवि होना असंभव समझा जाता था. श्रृंगार के संयोग और वियोग दशाओं का वर्णन आलंकारिक ढंग से किया गया. " जद्यपि सुजाति सुलच्छनी सुबरन सरस सुवृत. भूषण बिनु न बिराज ई कवित बनिता मित्त." उपर्युक्त अलंकरण के प्राधान्य को देखकर मिश्र बंधुओं ने इस काल को अलंकृत काल रखा. कविता और अलंकार का घनिष्ठ संबंध है. रीति काल के कवियों ने सचेत होकर यत्नपूर्वक अपनी वाणी को अलंकृत किया. उनके लिए कवि...