छायावादी दर्शन
छायावादी कवियों का काव्य प्रकृति मानवीय सौन्दर्य पर अधारित है. जयशंकर प्रसाद प्रकृति को जड़ न मानकर चेतन माना है. वहीं पंत प्रकृति के विभिन्न अवयवों में ब्रह्म का दर्शन करते हैं. प्रसिद्ध आलोचक डाक्टर नागेन्द्र ने छायावाद को स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह कहा है. नंददुलारे वाजपेयी ने प्रकृति के व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान कहा है. एक अन्य आलोचक शांति प्रिय द्विवेदी ने इन कविताओं में परमात्मा की छाया का भान कहा है.. इसमें अव्यक्त, निर्गुण, निराकार, अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन मानकर चित्र मयी भाषा में प्रेम की अभिव्यंजना की गई है. प्रसाद ने कामायनी में आनंदवाद की सृष्टि प्रत्यभिज्ञा दर्शन के आधार पर की है. वैष्णव कवियों ने आनंद के आलंबन को वाह्य जगत में देखा है लेकिन प्रसाद ने कामायनी में आनंद की अनुभूति आत्मा के भीतर की है. इसके अलावा कामायनी के दार्शनिक सिद्धांतों में समरसता का सिद्धांत, नियतिवाद, प्रत्यभिज्ञा दर्शन का समावेश है. जड़ और चेतन की समरसता पर प्रसाद ने इस पर प्रकाश डाला है --
"समरसता थे जड़ या चेतन
सुन्दर साकार बना था.
चेतना एक विरासत
आनंद अखंड घना था."
प्रसाद पर प्रत्यभिज्ञा, शैव दर्शन के अतिरिक्त उपनिषद, वेदांत बौद्ध दर्शन आदि का भी प्रभाव पड़ा है. इनका शैव दर्शन सामाजिक दर्शन न होकर समिष्ट दर्शन हो गया है--
"औरों को हंसते देखो मनु हंसो और सुख पाओ.
अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ."
प्रसाद ने कामायनी में दुख को अभिशाप न मानकर वरदान माना है. पंत को प्रकृति के विभिन्न अवयवों में परम ब्रह्म का संकेत दिखाई देता है.नक्षत्र तडित, फूल, लहरों में ब्रह्म दिखाई देता है. महादेवी ने प्रकृति के माध्यम से अपने निजी सुख- दुख को व्यक्त किया है-"मैं प्रेम भरी दुख की बदली".
छायावादी कवियों में दार्शनिक अनुभूति तथा रहस्य भावना की प्रधानता है. वाह्य की अपेक्षा अलंकारिता की प्रधानता है. निराला की रहस्य भावना में तत्व ज्ञान की प्रधानता है. पंत में प्रकृति सौन्दर्य की, तथा प्रसाद में परमसत्ता का अनुसंधान करने में. लेकिन छाया -वादियों की रहस्य भावना कबीर आदि की रहस्य भावना से भिन्न है.
छायावाद की द्वैत, अद्वैत या विशिष्टता द्वैत की तरह कोई दार्शनिक मान्यता नहीं है.यह सर्व व्यापक सर्वात्मवाद वादी तथा मानवता वादी साहित्यिक चेतना है जो जीवन की जड़ता एवं स्थूलता के विरुद्ध वैयक्तिक स्वतंत्रता का उद्घोष करती है.यह कोई वाद नहीं है, बल्कि यह विशिष्ट भाव भंगिमा है. छायावाद का कवि अपनी अनुभूतियों के प्रति जितनी आस्था या निष्ठा रखता है, उतनी वस्तुओं की बाह्य रूप रेखा के प्रति नहीं.
🌷🌷🌷🌷
गौरव मिश्रा
(स्रोत-- हिन्दी भाषा और साहित्य,रामबुझावन एवं विदुर)
Comments
Post a Comment