छायावाद और रहस्यवाद
छायावादी काव्य का प्रवर्तन जयशंकर प्रसाद की रचनाओं से हुआ. निराला की जुही की कली(1916) और पंत ने पल्लव(1920) की रचनाओं के साथ स्थायित्व प्रदान किया. प्रसाद की मृत्यु तथा और पंत और निराला के प्रगतिवाद कीओर रूझान होने से छायावाद का अवसान हो गया. इसलिए छायावाद का कार्य काल 1918 से 1936तक माना जाता है.
छायावाद की परिभाषा के संबंध में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है किसी कविता के भावों की छाया यदि कहीं अन्यत्र पडे तो उसे छायावादी कविता कहना चाहिए. डाक्टर नागेन्द्र ने छायावाद को स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह कहा है. नंददुलारे वाजपेयी ने कहा है मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म किन्तु व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान छायावाद की सर्वमान्य व्याख्या है. नंददुलारे वाजपेयी ने जिसे छायावाद नाम दिया है उसी को रामचंद्र शुक्ल ने रहस्यवाद कहा है. शुक्ल के अनुसार चिंतन के क्षेत्रों में अद्वैत वाद है, वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है.
छायावादी कवियों काव्य प्रकृति और मानवीय सौन्दर्य पर अधारित है. प्रसाद प्रकृति को जड़ न मानकर चेतन मानते हैं और पंत को प्रकृति के विभिन्न अवयवों में परम ब्रह्म का रूप दिखाई देता है. इसलिए बाबू गुलाब राय ने कहा है- प्रकृति में मानवीय भावों को आरोपित कर जड़ चेतन को एकीकरण की प्रवृत्ति निजी संबंध की ओर अग्रसर होती है, तभी रहस्यवाद का जन्म होता है.
छायावाद में प्रेम भावना विभिन्न रूपों में हुआ है--प्रकृति प्रेम, नारी प्रेम, मानव-प्रेम, अज्ञात प्रियतम के प्रति प्रेम. छायावादी कवियों के प्रेम चित्रण में वासना का पूर्ण अभाव है.
प्रसाद और महादेवी में प्रेम भावना का अधिक विकास हुआ है. अज्ञात प्रियतम के प्रति प्रेम भावना रहस्यवाद की ही प्रेम भावना है--
"मैं कण में डाल रही हूँ आंसू के मिस प्यार किसी का
मैं पलकों में पाल रहीं हूँ, यह सपना सुकुमार किसी का."
वेदना रहस्यवाद का आधार रूप है. उस चिरंतन प्रिय को वेदना से ही प्राप्त किया जा सकता है--
"ठहरो बेसुध पीड़ा को
मेरी न कहीं छू लेना
जब तक वे आ न जावें
बस सोती रहने देना."
छायावादी कवियों ने मानवीय मूल्यों को स्वीकार किया है. धार्मिक, राजनैतिक सामाजिक क्षेत्रों में वे पूर्णतया स्वच्छंदतावाद हैं. उनमें वैयक्तिकता की प्रधानता है. निराला की रहस्य भावना में तत्व ज्ञान की प्रधानता है, पंत में प्राकृतिक सौंदर्य की, महादेवी में प्रेम और वेदना की तथा प्रसाद में परमसत्ता अनुसंधान की.
"तोड़ दो वह क्षितिज मैं भी देख लूं उस ओर क्या है❓
जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है❓"
फिर भी छायावाद न तो शत प्रतिशत आत्मा की छाया है और न ही परमात्मा की.यह स्थूल वस्तु पर सूक्ष्म की छाया है. छायावाद का कवि अपनी अनुभूतियों के प्रति जितनी आस्था और निष्ठा रखता है, उतनी वस्तुओं की बाह्य स्थूल रूप--रेखा के प्रति नहीं.अनंत प्रियतम को आलंबन मानकर चित्रमयी भाषा में प्रेम की व्यंजना के लिए छायावाद के बदले रहस्यवाद शब्द का प्रयोग किया गया है . शुक्ल, रामकुमार वर्मा ने इस मत की पुष्टि की है, फिर भी भाषा शैली में समानता होते हुए भी वे पृथक काव्य धाराएं हैं. छायावाद का विषय लौकिक प्रेम है, रहस्यवाद का विषय आध्यात्मिक है. छायावाद में प्रणय का आलंबन रूपवती युवती है, रहस्यवाद में निर्गुण, निराकार प्रियतम के प्रति आत्म निवेदन. छायावाद का क्षेत्र मानव है, रहस्यवाद का क्षेत्र आत्मा है.🌷🌷🌷🌷
गौरव मिश्रा
(स्रोत--हिन्दी भाषा और साहित्य, रामबुझावन एवं विदुर)
Comments
Post a Comment