छायावाद की सौन्दर्य

छायावादी कवियों का काव्य प्राकृतिक और मानवीय सौन्दर्य की भूमि पर अधिष्ठित है. काव्य में प्रकृति चित्रण दो रुपों में किया जाता है--आलंबन और उद्दीपन. प्रकृति के विम्बग्राही स्वरूप के चित्रण में आलंबन का रूप चित्र मिलता है लेकिन प्रकृति का चित्रण जहाँ नायक और नायिकाओं की मनोदशा के अनुकूल किया जाता है, वहाँ उद्दीपन रूप में चित्रण होता है. छायावाद में अधिकांशतः प्रकृति चित्रण उद्दीपन रूप में मिलता है, आलंबन रूप में कम. संयोग में उसका मनोहारी रूप है और वियोग मे दाहकारी. षडत्ऋतु और बारहमासी के रुप में प्रकृति का उद्दीपन चित्र मिलते हैं. प्रसाद ने अपनी आरंभिक कविताओं में प्रकृति की रमणीयता पर मुग्ध हो सौन्दर्य प्रभावों को अंकित किया है. इनकी प्रकृति संबंधी दृष्टि में नवीनता और ताजगी है. वे प्रकृति को जड़ न मानकर चेतन मानते हैं, उस पर चेतना का आरोपन कर मानवीकरण करते हैं. कहीं उनका भाव विस्मय भरा है. प्रसाद रात्रि को नारी मानते हैं.---

"पगली हां संभाल ले कैसे छूट पडा़ तेरा अंचल.
देख विखरती है मणिराजी अरी उठा बेसुध चंचल."

                प्रकृति के विभिन्न अवयवों में परम ब्रह्म का संकेत दिखाई देता है.नक्षत्र, तडित, फूल, लहरे, खस्यो सभी में वह ब्रह्म रूप पाते हैं. महादेवी ने अपने निजी सुख-दुख की अनुभूतियों को प्रकृति के माध्यम से व्यक्त किया है--"मै नीर भरी दुख की बदली."

               अधिकांश छायावादी कवियों ने प्रकृति के कोमल, रमणीय और मोहक रूप को उभारा है. प्रकृति में वसंत ऋतु का स्थान सर्वोपरि रहा. इसके बाद पावन और शरद का आता है. इन प्रकृति वर्णनों के अन्तर्गत वन, उपवन, पवन, सरोवर, चन्द्र, चन्द्रिका, होली, हिंडोला, वर्षा की रिमझिम, कोयल की कूक, पपीहा की पुकार, बिजली की चमक आदि की मार्मिक और सुन्दर वर्णन है.

         नारी का रूप, यौवन और कोमल भावनाएं सदा से काव्य का विषय रहे हैं. छायावादी काव्य में नारी के रूप और यौवन के अनेक मोहक चित्र अंकित है. वे सूक्ष्म हैं. उसमें मांसलता और नग्नता कम हैं. प्रसाद ने कामायनी की श्रद्धा के अपूर्व सौन्दर्य का चित्रण किया है.---

"नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुली अंग.
खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघ बन बीच गुलाबी रंग."
             छायावादी कविता की प्रमुख प्रवृत्ति सौन्दर्यानुभूति है. सौन्दर्य की शाश्वत भावना इस कविता में सर्वत्र विद्मान है. छायावाद में सूक्ष्म सौन्दर्य की प्रतिष्ठा व्यापक पैमाने पर हुई है. अमूर्त अमरीकी सौन्दर्य प्रियता छायावादी कवियों को अधिक प्रिय थी.इस सौन्दर्य प्रियता को प्रकृति के माध्यम से व्यक्त किया गया है. विरहानुभूति का चित्रण बहुत ही मार्मिक है.--
             "विस्तृत जल का कोई कोना, 
                         मेरा न कभी अपना होना
              परिचय इतना इतिहास यही
                           उमडी कल थी मिट आज चली."
                                  🌷🌷🌷🌷
                                      गौरव मिश्रा
(स्रोत - हिन्दी भाषा और साहित्य, रामबुझावन एवं विदुर) 

              

Comments

Popular posts from this blog

दरबारी संस्कृति और रीति काव्य

प्रेमचंद की प्रासंगिकता

आंसू ( काव्य) :---- विशेषता