रीति काल के रीति मुक्त कवि
इस वर्ग के अन्तर्गत वे कवि आतें हैं जिन्होंने साधारण काव्य के रुप में रचना की और जिनकी रचनाओं में श्रृंगार रस विषयक विविध अवयवों का स्वयं समावेश हो गया. सेनापति और घनानंद इसी वर्ग के कवि हैं.
रीति काल के कवियों की कविता या तो बिहारी की तरह बौद्धिक है या मतिराम की भांति सहज. परन्तु इसी काल के कवियों की कविता भावपूर्ण कविता है. उसमें भाव प्रवणता की प्रधानता है. इनके काव्य में रीति कवियों के समान अलंकारों का बाहुल्यता एवं कृत्रिमता नहीं है. इन कवियों के श्रृंगार वर्णन में विषयों व्यक्ति यों की मुद्राओं का वर्णन कम है, बल्कि उनके द्वारा हृदय पर पडने वाले प्रभाव का वर्णन अधिक है. इन्होंने भावपक्ष को महत्व दिया है और कला पक्ष की उपेक्षा की है. ये शास्त्र के अनुसार काव्य की रचना करना काव्य के साथ खिलवाड़ मानते थे. ये कवि हृदय की अनुभूति को पूरी सच्चाई के साथ व्यक्त करने वाले कवि थे.
इनके प्रेम का स्वरूप बंधन हिन था. सूरदास आदि भक्त कवियों के समान कृष्ण और गोपियों का स्वछंद प्रेम इनका विषय रहा. इनका प्रेम पंथ, सीधा, सच्चा और निश्च्छल है. इनमें रीति कवियों की कृत्रिमता और उच्छृंखलता का अभाव है. इनका प्रेम ऐन्द्रिक अनुभव की वस्तु नहीं, बल्कि सूक्ष्म साधना का विषय है-- "यह सूधौ स्नेह का मारग है.
जहाँ ने कुछ सयानप बांक नहीं.
जहाँ साचन चलें तजि आपन पौ.
झिलके कपटी जे निसार नहीं."
इनकी अनुभूति सामान्य या लौकिक है. इसपर किसी प्रकार का आवरण नहीं है, जो कुछ लिखा है स्वानुभूति के रूप में लिखा है. जनता के संपर्क में रहने के कारण इन कवियों ने होली, गणगौर आदि त्योहारों का भी वर्णन किया है. इनका प्रेम व्यक्ति परक अनुभूति पर आधारित है और एकनिष्ट है. इनकी नायिका हाड़ मांस वाली प्रेमिका हैं. घनानंद की सुजान सर्व विदित है. इनकी पीड़ा टीस भरी हुई है-- "हमें कौन सों पीर कहैं अपनी.
दिलदार तो कोई दिखा तो नहीं."
इनका वियोग वर्णन व्यक्ति गत अनुभूति है. रीति कवियों का वियोग वर्णन कल्पना की उपज है. घनानंद ने वियोग की मार्मिक व्यंजना की है. प्रेम की साधना ही इनका मूलमंत्र रहा है. इनका प्रेम अधिकतर विषम है और यह जीवन की कठोर साधना है. घनानंद प्रेम की अग्नि में आजीवन जलने को प्रस्तुत है.----
"चाहो अनचाहे जान प्यारे पै अनन्दधन,
प्रीति रीति विषम सु रोम- रोम बनी है."
इनकी भक्ति भावना इनके व्यक्ति गत प्रेम का उदारीकरण है. घनानंद निम्बार्क संप्रदाय से दीक्षित थे और वे सखी भाव के भक्त थे. श्री कृष्ण के प्रति परकीया के रूप में प्रेम भाव निवेदित किया है. रीति काल के कवियों ने प्रेम निवेदन में रीति का सहारा लिया है. रीति मुक्त कवियों ने भक्त कवियों की भांति स्वयं अपने प्रेम का निवेदन किया है. इन्होंने अपने प्रेम पात्रों को सीधे संबोधित किया है. इनका काव्य लौकिक पक्ष प्रधान है इसलिए भाषा सहज और व्यवहारिक है. पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के अनुसार इन कवियों ने अलंकृत शैली का व्यवहार किया है, परन्तु पांडित्य प्रदर्शन के लिए नहीं, हृदय की स्थिति का सच्चा आभास देने के लिए. घनानंद का प्रेम निश्छल और सरल है--
" आन्नद निधान प्रान प्रीतम सुजान जी की.
सुधि सब भांतिन औ बेसुध करत है."
घनानंद भाषा प्रवीण थे. इन्होंने जनपदीय और स्थानीय शब्दों का सफल प्रयोग किया है. इनमें विरोधाभास के साथ मुहावरे भरे पड़े हैं. भाषा अत्याधिक सजीव है. वे अवधी और ब्रजभाषा दोनों के प्रयोग में प्रवीण हैं. वाक्य ध्वनि पदध्वनि से भी काम लिया है. भावपक्ष और कलापक्ष का पूर्ण विकास हुआ है. रीति मुक्त कवियों में घनानंद शीर्ष स्थान पर हैं.
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गौरव मिश्रा
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