आदिकाल की प्रमुख प्रवृतियाँ

हिन्दी साहित्य के ग्यारहवीं सदी से चौदहवीं सदुपयोग तक के समय को आदिकाल या वीरगाथा काल कहा जाता है. आदिकाल के नामाकरण के संबंध में विद्वानों में मतैक्य नहीं है.  सर्वप्रथम मिश्रबंधुओं ने अपने मिश्रबंधु विनोद में हिन्दी साहित्य के इस काल को 'आदिकाल' या 'रासोकाल' कहा. आदिकाल नाम तो तर्क संगत लगता है लेकिन रासो काल नाम उचित नहीं लगता है. क्योंकि रासो काव्य के अतिरिक्त और भी काव्यगत रचनाएँ इस काल में की जा रही थी.
                      रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल कहा है. लेकिन विद्वानों को इस  पर भी आपत्ति है.  क्योंकि वीरगाथात्मक रचनाओं के अतिरिक्त भक्तिपरक, आध्यात्मिक और उपदेश परक रचनाएँ इस काल की सौन्दर्य बढ़ा रही थी. इसलिए आचार्य शुक्ल द्वारा प्रतिपादित यह नाम भी सुसंगत प्रतीत नहीं होता.
            चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने आदिकाल को अपभ्रंश काल कह कर संबोधित किया है. यह नामाकरण अपभ्रंश भाषा के आधार पर किया गया है. अपभ्रंश एक स्वतंत्र भाषा है. इसलिए यह नाम भी औचित्य हीन है. सांकृत्यायन ने इसे सिद्ध सामंत काल कहा है. सिद्ध कोई प्रवृत्ति नहीं है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने इसे बीजवपन काल कहा है. साहित्यिक प्रवृतियों में बीजवपन पहले ही हो गया था. इस युग के साहित्य में स्पष्ट नहीं दिख है. इसलिए यह नाम भी उपयोगी नहीं है.
          राम कुमार वर्मा ने इसे संधि काल कहा है. वर्मा जी के संधि काल का अर्थ है अपभ्रंश साहित्य का अंत और हिन्दी साहित्य का प्रारंभ. चारण और भाटों द्वारा रचित रचनाओं के आधार पर इस काल को आपने चारण काल भी कहा. लेकिन इस युग में दो भाषाओं और प्रवृतियों का संगम कहीं दिखाई नहीं पड़ता.
              आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने मिश्रबंधु का नाम  आदिकाल को ही युक्ति संगत  माना है. इस काल के साहित्य में  हिन्दी के आदिरूप का बोध होता है. भक्ति काल से आधुनिक काल तक जितने भाव दिखते हैं, सभी के बीज आदिकाल में मिलतें हैं. इस काल की आध्यात्मिक, श्रृंगारिक, तथा वीरता की प्रवृतियाँ परवर्ती साहित्य में मिलती है. अतः  आदिकाल ही सबसे उपयुक्त और व्यापक नाम है.

                इस  काल  में वीरगाथात्मक रचनाएँ प्रचुर मात्रा में की गई. इस काल के रचयिता राजाओं के आश्रय में रहते थे. अपने आश्रयदाताओं के शौर्य की प्रशंसा बढा -चढ़ा कर करना उनकी विशेषता थी. चंदवरदाई ने पृथ्वी राजरासो में पृथ्वी राज की वीरता का वर्णन किया है. वीर रस के साथ श्रृंगार का सुंदर चित्रण किया गया है. लेकिन वीर रस की प्रधानता रही है. उस समय बाल और वृद्ध दोनों में युद्ध के प्रति उत्साह था. युद्ध को उत्सव माना जाता था और मृत्यु को आभूषण."बरस अठारह क्षत्रि जिए आगे जीवन को धिक्कार " यह उत्साह वर्धक पंक्ति है. युद्ध उन्माद के मूल में रमणी सौन्दर्य मुख कारण था उसमें प्रेम भावना और राष्ट्रीयता का अभाव था . इस काल में युद्धों का वर्णन बहुत सटिक हुआ तथा युद्ध का आंखों देखा हाल प्रस्तुत किया गया है.
          खुसरो की पहेलियाँ, विद्यापति की पदावली आदि मुक्तक काव्य है. नरपति नाल्ह द्वारा रचित बीसलदेव रासो मुक्तक और वीर गीतिकाव्य है.
         आदिकालीन काव्य की विशेषता  तुक का मिलान ,छंद, चौपाई, छप्पय आदि है. प्रायः सभी अलंकारों का प्रयोग यथा अनुप्रास, यमक, श्लेष, वीप्सा,उपमा, अतिश्योक्ति आदि इस युग की रचनाओं में मिलते हैं.
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                                                 गौरव कुमार🙏
  
                                                   

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