सरोज-स्मृति में निराला के अनुभव एवं शिल्प की व्याख्या कीजिये.
'सरोज-स्मृति' निराला का प्रसिद्ध शोक गीत है. अपनी पुत्री के आसमयिक निधन पर निराला ने शोक- संतप्त ह्रदय की विह्वल भावनाओं को इस रचना में वाणी दी है, अल्पायु में ही सरोज की मृत्यु ने निराला के ह्रदय को आहत कर दिया.इस कविता के भाव और शिल्प का गठन कविता को श्रेष्ठ गीतों में स्थान दिलाता है.इस गीत का मूल भाव अपने प्रिय जन के मृत्यु पर यह एक प्रकार का हृदय श्रद्धा व्यक्त करता है शोक एक प्रकार का ऐसा मनोभाव है जिसमें प्रगाढ़ राग, अनुरक्ति की पीड़ा भी मिश्रित रहती है यह शोक मर्म पीड़ा का परिचायक होता है.
'सरोज-स्मृति' में शैली की भावुकता, मिश्रित आक्रोश, भावना का क्षुब्धता तो है ही किन्तु वह आत्मरक्षा भी है, अपनी विवशता और समाज की क्रूरता मिश्रित मिलता के संदर्भ से ही है. निराला के इस शोक गीत का आलंबन उनकी पुत्री सरोज है जिसका देहांत सवा अठारह वर्ष की आयु में हो गया था. विषम परिस्थितियों के शिकार निराला के लिए उसका देहांत काफी कष्ट दायक सिद्ध हुआ और बेटी की मृत्यु ने फिर क्या निराला को पूरी तरीके से झकझोर दिया. क्योंकि पुत्री सरोज को न तो माँ का सुख मिला, वह अपनी नानी की गोद में पलती रही और बाल्याकाल को लांघकर वह तरुणाई की देहरी पर अपनी कदम रखा. गरीब, विद्रोही निराला जी ने किसी भांति उसका विवाह किया परन्तु वह ज्यादा दिनों तक जीवित न रह सकी, निराला के सामने उनकी पुत्री का देहांत हो गया, निराला के जीवन पर इससे घातक प्रहार क्या हो सकता है और भावुक कवि या पिता कि मन इस असह्य घड़ी में रोये बिना कैसे रह सकता था? निराला जी बेटी की मृत्यु से एकदम टुटकर बिखर गये और आहत पिता के सामने उसके जीवन से संबंधित अनेक घटनाएं घूम गयी.इस घटना के द्वारा कहीं उनकी असमर्थता का चित्र उभर आया, कहीं अपने विद्रोही रुप स्मृति पथ में आकर उसके देहांत की असामयिक की पुष्टि करता हुआ, उनकी पीड़ा को बढाने लगा और कभी अपनी जाति और वर्ग की आचार व्यवहार के प्रति अपनी क्षुब्धता की स्मृति को 'सरोज-स्मृति' की ओर तीव्र करने लगी
निराला जी अपनी उद्विग्न स्थिति का चित्रण अपनी रचना सरोज-स्मृति में किया है. अंग्रेजी शोक गीतों के संदर्भ में जिस उदात्त आध्यात्मिक संकेत के सन्निवेश को उसकी विशेषता के रूप में ग्रहण किया गया है. निराला का शोक गीत उसी से शुरु होता है----
" गीते मेरी, तज रुप नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम----
करती हूँ मैं, यह नहीं भरण
सरोज का ज्योति शरण- तरण, "
सरोज का मृत्यु किसी आत्मगत विवशता का द्योतक नहीं है, उसकी अपनी पीड़ा का सूचक नहीं है. सरोज अर्थात कमल का, ज्योति अर्थात सूर्य की शरण जान भी लक्षित करता है.इस प्रकार सूर्य और कमल के अनन्य भाव के माध्यम से जीव तथा परमात्मा की सहचारिता को भी सामने लाता है. वे पुत्री को अनेकों नामों से जीवित कविते, गीते, धन्ये,शुचिते, परी चपल और गरिमा के रूप में संबोधित करते हैं, अनेकों प्रकार के संबोधन के बाद भी निराला अपनी पीड़ा को दबा नहीं सके, उनके अपने धैर्य के बांध टूट जाता है यदि निराला ने उस घटना को साधारणतया नहीं लिया उनकों अपनी विवशता, अक्षमता और कुछ भी नहीं करने का परिणाम गहराता जाता है.समस्त कविता में उनकी अपनी पीड़ा है अपना व्यक्तित्व है. निराला को अपने पितृत्व की निरर्थकता और अपनी परिस्थितियों की विषमता इस प्रकार घेर लेता है कि उनकी सारी कविता में उनकी विषमता छायी रहती है और जीवन के अनेक विकार चित्र रह-रहकर कविता में उपस्थित होते चलते हैं. दु:ख के उस विपुल परिवार में निराला खुद को रोकने का प्रयत्न करते हुए भी अपनी कष्ट कथा को कहे बिना नहीं रह पाते. उन्हें सबसे ज्यादा दुःख अपने अर्थ होता का ही है. सब कुछ करते हुए भी वह धनार्जन नहीं कर सके और अपनी पुत्री को यथा संभव सुख भी न प्रदान कर सके.अनन्य भाल से जो वे साहित्य सेवा करने रहे थे वह इतने साधन भी न जुटा पाई जिसके कारण निराला का पिता बनना कष्ट दायक प्रतीत होता है---
"धन्ये मैं पिता निरर्थक था
कुछ भी तेरे हित कर न सका----
रखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ समर. "
जिस निराला ने अपने वस्त्र तक उतारकर भिखारियों को दान कर दिया हो आज वही निराला स्वयं आर्थिक अभिशाप को झेल रहे हैं. अपूर्ण साध्य और कर्तव्य पालन की असमर्थता का कारण जैसा अर्थगमोपाय न जानना था, वैसा ही उनकी हिन्दी साहित्य की सेवाओं को दूसरे के द्वारा की गई उपेक्षा भी था. संपादकों के पास से लौट आयी अपनी कविताओं से निराला जी को घोर आत्मिक कष्ट पहुँचा और वे बहुत निराश हुए. निराला की यह असमर्थता एक अभावग्रस्त व्यक्ति की दीन हीन स्थिति का चित्र अवश्य है परन्तु किसी ऐसे व्यक्ति का यथार्थ नहीं है जो अपनी विवशताओं से जुड़े से घबराकर आत्मसमर्पण कर देता है, टूट जाता है और अपने स्वत्व और स्वाभिमान को भी भूल जाता है. उनकी दीनता अपनी पुत्री के अधिकाधिक विवर्द्धित गौरव की तुलना में ही दीनता है अन्यत्र कहीं भी अपने हेतु विवशता नहीं झलकती, इसी कारण से उनके हीनता पिता की ममता का उज्ज्वल आलोक विकीर्ण करती है. निराला की दीनता आत्मसमर्पणशील व्यक्ति की दीनता नहीं है बल्कि अपने प्रिय के प्रति प्रबल अनुराग के कारण उसके लिए यथेष्ट न कर पाने की विफलता मात्र है. पुत्री के प्रति यह गाढानुराग उन्हें वात्सल्य की भूमि पर ले जाता है, उनकी पूर्व स्मृतियाँ तीव्र हो उठती है और स्वयं कवि का व्यक्तित्व उभर आता है और इसके परिणामस्वरूप दु:ख की छाया और भी गहरी हो जाती है.इस प्रकार पिता के कर्तव्य से मुक्ति पाकर जब निराला सुख की सांस लेते हैं तभी ऐसा क्षण आया कि उन्हें सदा के लिए शोक प्लावित कर दिया, दो वर्ष नानी के पास रहकर जब सरोज बीमार पड़ जाती है और अर्थभाव में जब उसका उपचार नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है. उसी कण कवि निराला अपनी भाग्य हीनता से विकल्प हो उठते हैं. शोक ग्रस्त निराला शिथिल होकर अन्ततः अपने विगत कर्मों का अर्पण करके कन्या का तर्पण करते हैं. जो व्यक्ति अर्थाभाव में और साधनों से पुत्री के तर्पण की भी व्यवस्था नहीं कर सका वह और क्या करता यदि वह अपने कर्मों का भी अर्पण भी न करता. निराला जी पुत्री के मरने के बाद सबकुछ त्याग कर मौन हो गएऔर उनकी संपूर्ण चेतना आहत हो गई उनका मन तथा मस्तिष्क टुटकर बिखरने लगा. गहरे शोक में डुबी इस करुणा कथा की कला संसार में उतना ही उत्कृष्ट है जितना इसके भाव से पूर्ण अंतरंग पक्ष. अत: ये कहा जा सकता है कि निराला कृत 'सरोज-स्मृति' भाव तथा भाषा दोनों ही दृष्टियों से एक श्रेष्ठ कलात्मक कृति है. इस रचना का महत्व इस कारण और भी गहरा हो जाता है क्योंकि ऐसे रचना किसी कवि ने अपनी पुत्री हेतु नहीं कर. नए भाव, नए शब्द के सृजन में छायावादी कवियों में निराला विशेष हैं.🌷🌷🌷🌷
गौरव मिश्रा
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