प्रगतिवादी काव्य:--
प्रगति का अर्थ है--आगे बढ़ना. जो साहित्य जीवन को अग्रसर करने मे सहायक हो वह प्रगतिशील साहित्य है. इस दृष्टि से तुलसी दास अधिक प्रगति वादी हैं. भारतेन्दु और द्विवेदी युग के लेखक गुप्त जी इसी अर्थ में प्रगतिशील लेखक हैं. लेकिन आज के विद्वान इनमें से किसी को प्रगतिवादी नहीं मानते.उनके अनुसार ये सभी प्रतिक्रिया वादी लेखक हैं. अत:प्रगति का अर्थ एक विशेष दिशा में आगे बढ़ना है. इसकी एक विशेष परिभाषा है जिसका आधार द्वन्द्वात्मक भौतिक वाद है.
भौतिक वाद का अर्थ है- संसार का मूल आधार पदार्थ है. विश्व में केवल एक सत्ता है --
-आधिभौतिक. आध्यात्मिक और आधिदैविक सत्ता छल मात्र है. संसार का निर्माण कोई दैवीय सत्ता का परिणाम नहीं है और न ही किसी विशेष मानव द्वारा सृजित. यह गतिशील पदार्थ की जीवित अग्नि शिखा है जो ऊर्ध्व विकास और अध:पतन की ओर उन्मुख है. गति की इन विरोधी शक्तियों के संघर्ष और द्वन्द्व का अध्ययन करना ही द्वंद्वात्मक भौतिक वाद है.इन विरोधी शक्तियों में एक विकास के पथ पर और दूसरी विनाश के पथ पर है. चेतन मनुष्य काम प्रगति शील शक्तियों को सहायता करना और विनाशोन्मुख शक्तियों को नाश करना है.
जीवन का एक मात्र सत्य भौतिक जीवन है. उसी का स्वस्थ उपयोग हमारा ध्येय है. इस भौतिक जीवन की प्रमुख संस्था समाज है, जिसका आधार धन है. जीवन के चार उद्देश्य (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से प्रगतिवाद केवल अर्थ को स्वीकार किया है. चूकि मोक्ष आध्यात्मिकता का विषय रहा है इसलिए प्रगतिवादियों द्वारा यह अस्विकृत है.
आज के युग में दो विरोधी शक्तियां हैं:- पूंजी वाद और साम्यवाद. पूंजी वाद का एक अंग साम्राज्यवाद है.यह विनाशोन्मुख है और साम्यवाद विकासोन्मुख है. प्रगति वाद साम्यवाद का पोषक है और पूंजी वाद का शत्रु. अर्थात प्रगति वाद साम्यवाद का ही साहित्यिक अभिव्यक्ति है. साहित्य सामाजिक कर्म विधान का एक सक्रिय अंग है. समाज का दलित और शोषित वर्ग जागृत शक्तियां हैं. प्रगति वादी साहित्य उनकी सहायता करता है और उनके पक्ष में आंदोलन करता है.
साम्यवाद प्रगति वादी साहित्य को सामाजिक या सामुहिक चेतना मानता है वैयक्तिक नहीं. साम्यवाद समूह के हितों की रक्षा करता है व्यक्ति की नहीं. वैसे ही प्रगति शील साहित्य समाज के सुख - दुःख की अभिव्यक्ति करता है. कविता के सुख- दु:ख की अभिव्यक्ति नहीं.इस प्रकार प्रगतिशील साहित्य का उद्देश्य अहं का सामाजिक है. यहाँ "सत्यम् , शिवम्, सुन्दरम्" का अर्थ बदल गया है.सत्य का अर्थ भौतिक वास्तविकता है, शिव का अर्थ भौतिक जीवन और सुन्दर का अर्थ है सामाजिक स्वास्थ्य. इसलिए प्रगति वादी ने अपनी अभिव्यक्ति का उपकरण स्वस्थ जन जीवन से ग्रहण किया. उनकी अलंकरण सामग्री सूक्ष्म और कोमल नहीं है, वह स्थूल और प्रकृति है.
प्रगति वाद एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है जिसके मूल तत्व हैं:--द्वंद्वात्मक भौतिक वाद, साम्यवाद और राष्ट्रीय भावना. प्रगति वाद रचना और आलोचना के क्षेत्र में एक नवीन दृष्टिकोण लेकर आया.यह सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति को ही रचना का उद्देश्य मानता है. प्रत्येक युग में यथार्थ की दो शक्तियों का द्वंद्व चलता रहता है. मरणोन्मुख पुरानी शक्तियों का और नवीन जीवंत शक्तियों का. पुरानी शक्तियों में समाज के शोषक लोग हैं और नवीन शक्तियों में समाज के शोषित लोग. आज के युग - युग की बुनियादी शक्तियां वही है जो पूंजी वाद को नष्ट कर समाज वाद की रचना करे.
प्रगति वाद ने सौन्दर्य को न ए दृष्टिकोण से देखा है. यह वर्तमान जीवन में सौन्दर्य खोजता है. सौन्दर्य का संबंध ह्रदय और मन दोनों से है.इन दोनों का संबंध सामाजिक संबंधों से है. मनुष्य को जीवन सबसे प्यारा है और सौन्दर्य ही जीवन है.
प्रगति वाद साहित्य को सोद्देश्य मानता है. किसी विशेष अभिप्राय या विशेष दृष्टि से कला की रचना होती है. मार्क्स वाद ने साहित्य में प्रचार का विरोध किया है. कला का शिल्प उसके वक्तव्य विषय के अनुसार होता है. प्रगति वादी कविता सामाजिक जीवन की वास्तविकता को लेकर चली. इसलिये सुस्पष्ट, सामान्य और प्रचलित भाषा का प्रयोग हुआ. उसने प्रतीक, बिंब, शब्द , मुहावरेंऔर चित्र जनजीवन से लिए. भाषा की यह स्पष्ट वार्ता अति पर पहुँच गईऔर उसमें अभिधा की प्रधानता हो गई. जिसमें भाषा उपदेशात्मक हो गई. फिर भी प्रगतिवाद ने हिन्दी काव्य धारा के विकास में एक नया अध्याय जोडा. निराला, पंत, केदारनाथ अग्रवाल रामविलास शर्मा, नागार्जुन, शिव मंगल सिंह सुमन, मुक्ति -बोध इस धारा के प्रमुख कवि हैं. हिन्दी कविता में प्रगति वाद का अविर्भाव सन् 1935 - 40 के आसपास हुआ. छाया वाद के जो प्रमुख प्रवर्तक था वही प्रगति वाद का पहला कवि था अर्थात पंत. पंत की युग वाणी और ग्राम्या प्रगति शील काव्य की प्रमुख कृतियाँ हैं--पंत के सहयोग में नरेंद्र ने 'पलाशवन', 'मिट्टी और फूल' आदि में अनेक प्रगतिशील कविताएँ लिखीं. अंचल की 'मधुलिका'और 'अपराजिता' इसी वर्ग की कविताएँ हैं. शिव मंगल सिंह सुमन की अनेक रचनाओं में प्रगति वाद का गहरा रंग रहा. लेकिन हिन्दी साहित्य में मानव वाद ही मुख्य है. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद बहुत कम है. अधिकांश कवियों में व्यक्ति गीत की प्रधानता है.आज के अधिकांश कवि कल के छायावादी कवि हैं इसलिए उनमें रोमांस बार -बार उभर आता है. इसमें विशेषता यही है कि यथार्थ वादी होते हुए भी कवि कला और सौन्दर्य चेतना से अलग नहीं हटे. सौन्दर्य के माध्यम से समाज के जीवंत रुप प्रस्तुत करना जिससे साहित्य जनता से जुड़े. यही प्रगति वादी कवियों की बड़ी उपलब्धि है.
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गौरव मिश्रा
(श्रोत--" हिन्दी भाषा और साहित्य " राम बुझावन एवं विदुर)
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