रासोकाव्य की प्रमुख विशेषताएं:----

हिन्दी के आदिकाल या वीरगाथाकाल के काव्य प्रबंध काव्य तथा मुक्तक वीर गीतों के रूप में उपलब्ध है. इन की प्रवृति वीर रस प्रधान है और ये रासो कहलाते हैं.
                          दल पति विजय का 'खुमानरासो' वीरगाथा काल का प्रबंध काव्य है. इस ग्रंथ में कवि भोज के पश्चात मेवाड़ के सिंहासन पर बैठने वाले गुमान द्वितीय के युद्धों का सजीव चित्रण है. विद्वानों का विचार है कि 'खुमानरासो' की मूल प्रति में प्रक्षिप्त अंश समाविष्ट किया गया है. इसकी भाषा राजस्थानी है तथा विविधमुखी छंदों का प्रयोग हुआ है. यह अत्यंत सरस रचना है. नरपति नाल्ह का 'विसलदेव' रासो गेय मुक्तक परंपरा का प्रतिनिधित्व ग्रंथ है. इतिहासकारों ने इसे वीर काव्य माना है लेकिन वस्तुतः यह प्रेमाख्यान की कोटि में है. इसमें विवाह के बाद दाम्पत्य प्रेम के विकास का चित्रण है इस ग्रंथ के रचना काल, रचयिता और चरित्र नायक विवाद ग्रस्त है. कुछ विद्वान अजमेर और सांभर राजा विग्रह राज चतुर्थ को इसका चरित्र नायक मानते हैं, तो कुछ विग्रह राज तृतीय को.
                       'विसलदेवरासो' चार खंडों का एक विरह काव्य है. प्रथम खंड अजमेर के विग्रह राज चतुर्थ उपनाम बीसलदेव का परमार वंशज राजाभोज की कन्या राजमती से विवाह वर्णित है. द्वितीय खंड में राजमती के व्यंग्य से बीसलदेव का उडीसा प्रवास तृतीय खंड में राजमती का विरह और चतुर्थ खंड में राजमती का नैहर चला जाना तथा बीसलदेव का नैहर से लाने का वर्णन है. डाक्टर हजारी प्रसाद नरपति नाल्ह को ही इसके रचयिता मानते हैं.इस ग्रंथ की भाषा में अपभ्रंश एवं हिन्दी पन दोनों है.यह मुक्तक काव्य है.
                      जगनिक  का 'परमालरासो' जगनिक कालिंजर के राजा परमाल के दरबारी कवि थे. पृथ्वी राज चौहान ने परमाल पर आक्रमण किया था. जगनिक के 'परमालरासो' के आल्हा खंड में परमाल राजा के वीर सामंत आल्हा ऊदल की वीर गथाएं चित्रित की हैं. युद्ध में दोनों वीर शहीद हो गए. आल्हा खंड एक वीर गीत ग्रंथ है.इस ग्रंथ को सबसे पहले फरुखाबाद के कलक्टर मिस्टर चार्ल्स इलियट ने प्रकाशित किया था.
              चन्दबरदाई 'पृथ्वी राज रासो' हिन्दी का महान महाकाव्य है और वीर गाथा काल का प्रमुख प्रतिनिधि ग्रंथ है.यह प्रबंध महाकाव्य है. यह उनहतर
  अद्धायों में छप्पय, कविता, दूहा, तोमर आदि छंदों में रचा गया है. इसके रचयिता पृथ्वी राज के सामयिक कवि चंद्रवरदायी हैं.इस ग्रंथ में अजमेर के पृथ्वी राज चौहान और कन्नौज के जयचंद का वर्णन है.जयचंद की पुत्री संयोगिता ने पृथ्वी राज की स्वर्ण मूर्ति पर वरमाला पहना दिया. पृथ्वी राज और उसके सामंत संयोगिता को हरण कर ले गए. 🌷🌷🌷🌷
                 गौरव मिश्रा

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