माखन लाल चतुर्वेदी : राष्ट्रीय चेतना

कविवर माखनलाल चतुर्वेदी की सबसे बड़ी विशिष्टता है- उनकी कविताओं का राष्ट्रीयता एवं राष्ट्र भक्ति की चेतना से ओतप्रोत होना. वे राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित थे. अत: इन्होंने अपनी कविताओं में सामाजिक यथार्थ को सजीव रूप में प्रतिबिंबित किया . ये अपनी कविताओं में देश- प्रेम, भाव-प्रेम, मधुर और प्रेरक चेतना का संचार करनेवाले अन्यतम सांस्कृतिक मानवतावादी स्वरूप को लेकर अवतरित होते हैं. इनकी राष्ट्रीयता व्यापक और उदात्त होती हुई भी मुख्यतः भावात्मक रही और आदर्शमय रही.
                      चतुर्वेदी जी को भारतीय राष्ट्रीयता का प्रेरक कहा जाता है. इनकी कविताएँ कला, भावना व जोश का एक साथ साक्षात्कार कराती है. इनके काव्य में अनेक ऐसे स्थल हैं, जहाँ राष्ट्रीयता कूट कर भरी मिलती है. इनकी भक्ति परक रचनाएँ भी राष्ट्रोन्मुख हो जाती है, तथा इनके यहाँ प्रेम की परिणति भी राष्ट्रप्रेम में ही होती है.इस प्रकार इनकी रचनाओं में प्रेम, प्रकृति, भक्ति सब कुछ आगे चलकर राष्ट्रीयता में समाहित हो जाती है. वे कहते हैं--- " मैं बलि का गान सुनाती हूँ, प्रभु के पथ पर बनकर फकीर.
माँ पर हॅंस- हॅंस बलि होने में खिंच हरी रहे मेरी लकीर."
                   चतुर्वेदी जी के काव्य- व्यक्तित्व के अनेक रुप हैं, लेकिन राष्ट्रीयता के धागे है से ही सभी रुप बंधे हुए हैं. इनकी समस्त भावना सरिता राष्ट्र - समुद्र में ही जाकर मिलती है. इनकी अधिकांश रचनाओं में राष्ट्र प्रेम ही प्राप्त होता है, जिन्हें चार भागों में विभक्त किया जा सकता है--- रहस्य मूलक राष्ट्र काव्य, प्रेम मूलक राष्ट्रीय काव्य, प्रकृति मूलक राष्ट्रीय काव्य और संश्लिष्ट राष्ट्रीय चेतना का काव्य.
                  चतुर्वेदी जी के वाणी में शक्ति और सजीवता है. इनके उद्बोधन की शक्ति के साथ- साथ पतित राष्ट्र के उन्नत रुप देने की कामना एवं वीरत्व एवं ओज की भावना भी है. इनकी राष्ट्रीय कविताओं में से विशेष रूप से 'उन्मूलन वृक्ष' , 'बलिदान', 'सिपाही', 'पुष्प की अभिलाषा' , 'कैदी और कोकिला' आदि उल्लेखनीय है. यहाँ कवि कर्म में विश्वास जागृत करता है और बलिदान के लिए वीर युवकों को प्रोत्साहित भी करता है-  " देह? -प्रिय यहाँ -कहाँ परवाह, टंगे शूली पर चर्म क्षेत्र, 
गेह छोटा -सा हो तो कहूँ, विश्व का प्यारा धर्म क्षेत्र."
                      इनकी कविता 'पुष्प की अभिलाषा' में राष्ट्र भक्ति एवं बलिदान की भावना ने सर्वाधिक अभिव्यक्ति पायी. वीरों के पथ पर बिछ जाने की चाह करने वाला पुष्प मात्र प्रेम के क्षेत्र में विसर्जित होने से इंकार कर देता है.वह कहता है-- "मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तू फेंक
मातृभूमि पर शीश चढाने जिस पथ जावें वीर अनेक." 
कवि ने फूलों के माध्यम से महत्वपूर्ण बात को सामयिकता के रंग में रंग कर अनोखा बना दिया है.
                   रहस्य मूलक काव्य के अंतर्गत कवि ने भक्ति आद्यात्मिकता और प्रेममार्गी कवियों की रहस्य मूलक अभिव्यक्तियों को वाणी दी है. ये राष्ट्र सेवा को भी आराध्योपासना  एवं देश भक्ति को साधना मानते हैं. इनके प्रौढ़ मूलक काव्य में रहस्य मूलक राष्ट्रीयता का स्वर और मुखर हो जाता है. कवि बलिशाला और मधुशाला प्रलय और प्रणय में कोई अंतर नहीं समझता. कवि की अध्यात्म मूलक राष्ट्रीयता में भक्ति और प्रेम दो ही तत्व काम करते हैं. वह कहता है-- "मेरे बलिदान ज्ञान-कर्म-भक्ति धार हो."
                    प्रेम मूलक राष्ट्रीय काव्य में तो श्रृंगार अपने अलग रूप में अभिव्यक्त हुआ है.एक ओर कवि की भक्ति देश प्रेम में परिवर्तित हो जाती है तो दूसरी ओर उसकी प्रेम भावना भी राष्ट्र प्रेम में परिणत हो जाता है. उसकी अधिकांश प्रेम कविताओं में प्रेम और बलिदान का द्वंद्व स्पष्टतः दिखाई पड़ता है.वह अपने स्नेह गान में भी राष्ट्र के कष्टों को नहीं भूलता-- "प्रिय कौन सा मधु गान? 
गान? जब रिपु जगाता भारतीय मसान."
                 कवि का जीवन आत्म निरपेक्ष भाव से राष्ट्र हित और राष्ट्र कल्याण के लिए समर्पित हो जाता है. यह समर्पण ही उसका सबसे बड़ा लक्ष्य हो जाता है. वह बार- बार यही चाहता है कि " मातृभूमि हित के कष्टों का राज्य पुनः पाऊँ सविवेक."
                       चतुर्वेदी जी के काव्य में प्रकृति भी अपने विशुद्ध रुप में न आकर राष्ट्रीय भावना से जुड कर ही प्रस्तुत होती है. फलतः राष्ट्रोन्मुख प्रेम काव्य की तरह उसकी प्रकृति प्रेम परक रचनाएँ भी भी राष्ट्रीयता पर ही जाकर समाप्त होती है. उन्हें तबतक प्रकृति का इठलाना  नहीं सुहाता, जब तक राष्ट्र स्वतंत्र नहीं हो जाता--"फिर कुहू! अरे क्या बंद न होगा गाना.
           इस अंधकार में मधुराई दफनाना? "
                                
                       इनकी संशि्लष्ट राष्ट्रीय चेतना के वाले काव्य में कई अन्य प्रमुख प्रवृत्तियाँ दिखाई पड़ती है. ये हैं विद्रोह मूलक राष्ट्रीय भावना, बलिदान मूलक भावना, गांधीवादी राष्ट्रीयता, सामाजिक राजनैतिक चेतना, देश प्रेम व वीर पूजा की भावना एवं जनजागरण एवं उद्बोधन परक रचनाएँ. इन रचनाओं में सर्वाधिक त्याग और बलिदान का स्वर मुखरित हुआ है. इनकी राष्ट्रीयता बलिदान वादी राष्ट्रीयता है. इनके संम्पूर्ण काव्य का मूल स्रोत यही भावना है.
                 निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि चतुर्वेदी जी की आत्मबलिदान की प्रेरणा से युक्त राष्ट्रीय भावना का उत्कर्ष इस युग में छाया हुआ है. युगीन जीवन की वास्तविक और उत्प्रेरक अभिव्यक्ति ही इनके काव्य का वास्तविक आनंद है. राष्ट्रीय संस्कृति का जैसा मुखर गान  माखनलाल चतुर्वेदी ने किया है, वैसा किसी अन्य ने नहीं. उनका समूचा राष्ट्रीय भाव सभी तत्वों से मिलकर एक सबल रुप ग्रहण करता है, जिससे उनकी कविताएँ सदा- सर्वदा के लिए प्रेरणा स्रोत बनी और अंत तक अदम्य और भावनात्मक बनी रही.🌷🌷🌷🌷
                                               गौरव मिश्रा.

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