आंसू :--- प्रतिपाद्य
जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्य के जनक होने के कारण आधुनिक काव्य धारा के गौरव मय प्रति निधि कवि हैं. प्रसाद जी के कोमल कल्पना ने प्रेम के स्वरूप को उपस्थित करते हुए मधुर और कोमल भावनाओं से कविता का श्रृंगार किया . इस प्रकार प्रसाद प्रेम और सौन्दर्य के कवि हैं. प्रेम उनके काव्य शरीर में आत्मा की तरह व्याप्त है.'आंसू' प्रेम की मधुर स्मृति यों को अभिव्यंजित करने वाला जयशंकर प्रसाद कृत प्रसिद्ध काव्य है.
'आंसू' एक लंबा प्रतीकात्मक काव्य है.यह एक उच्छवास पूर्ण प्रेम काव्य भी है, जिसमें प्रेयसी के वियोग में प्रेमी के आंखों से गिरे हुए आंसूओं का संकलन है. इसमें कवि मुख्यतः श्रृंगारिक भावों की अभिव्यक्ति दी है. इसमें श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का अत्यंत उत्कृष्ट वर्णन हुआ है. मधुर दिनों की स्मृति कर कवि संयोग श्रृंगार का वर्णन करता है.
'आंसू' के प्रारंभ में ही कवि कहता है कि उसका समस्त सुख नष्ट हो गया है और अब स्मृति शेष है. वह अपने सुखमय अतीत जीवन का स्मरण कर अपनी वेदना का विस्मरण करना चाहता है---
"मादक थी, मोहमयी थी मन बहलाने की क्रीड़ा,
अब हृदय हिला देती है वह मधुर प्रेम की पीड़ा."
कवि को अतीत के उस मधुर क्षण की भी स्मृति होती है जब उसने बसंत - चन्द्रिका से स्नात विभावरी में पहली बार अपनी प्रिया की छवि देखी थी.उस प्रिया का सौन्दर्य अनुपम था. कवि ने अपनी प्रिया का नख- शिख -वर्णन करते हुए रूप सौन्दर्य के
कई आकर्षक चित्र खींचे हैं, यथा--
"हिलते द्रुम दल किसलय देती गलवांही डाली,
फूलों की चुम्बन छिडती मधुपों की तान निराली."
'आंसू' में वियोग श्रृंगार की बहुलता है. कवि कहता है कि श्रृंगारावस्था में जो बर्फ की भांति शीतल होता था, वही अब अंगारे बरसाने लगा है--
"हीरे सा ह्रदय हमारा, कुचला शिरीष कोमल ने,
हिम शीतल प्रलय अनल बन, अब लगा विरह से जलने."
इस वियोगावस्था में कवि यह अनुभव करता है कि जन्म-जन्म से सुख-दु:मय जीवन का एक चक्र चलता रहता है. वह सोचता है कि मानव जीवन का रहस्य ही सुख के बाद दु:ख तथा संयोग के बाद वियोग की अनुभूति मे है. अतः हमें चाहिए कि सुख दुःख से उदासीन होकर सुख- दु:ख को एक बना दें--
"लिपटे सोते थे मन में
सुख-दु:ख दोनों ही ऐसे.
चंद्रिका अंधेरी मिलती
मालती कुंज में जैसे."
'आंसू' का अंत कवि विषाद में नहीं करता. जब उसका हृदय प्रेमिका को उपालंभ देते हुए थक जाता है तथा अतीत की स्मृति में अपने आंसूओं को बहा कर हृदय का कोश खाली कर लेता है तो उसका अवसान आशा में करता है.वह अभाव को संसार का कठोर सत्य स्वीकार कर जीवन से समझौता कर लेता है.वह अपने व्यक्ति गत दु:ख से जगत को दु:खी करना नहीं चाहता.वह अपने जीवन की करुणा से लोक- मंगल एवं लोक कल्याण की कामना करता है.वह सोचता है कि संसार भर की पीड़ा को उसका हृदय आत्मसात कर ले और इस वेदना से जो 'आंसू' बरसे वह लोक में आशा एवं उल्लास का संचार करे--
" सबका निचोड़ ले कर तुम,
सुख से सूखे जीवन में.
बरसो प्रभात हिमकण- सा,
आंसू इस विश्व-सदन में."
इस प्रकार से 'आंसू' निराशा में आशा का, मृत्यु में जीवन का उपदेश देता है. जयशंकर प्रसाद आनंदवादी हैं. शंकर के शुद्ध आनंदवाद की कल्पना पुराणों में समुद्र - मंथन के द्वारा व्यक्त की गई है. जिस कालकूट विष से देव - दानव के तीनों लोक जले जा रहें थे, शंकर लोक कल्याण के लिए उस हलाहल को पी गए और उसकी ज्वाला को स्वयं आत्मसात करके विश्व के लिए शिव अर्थात कल्याणमय बन गए. कवि 'आंसू' में भी उसी सिद्धांत को अपनाता हुआ प्रतीत होता है----
"जगती का कलुष अलावा,
तेरी विदग्धता पावे.
फिर निखर उठे निर्मलता,
वह पाप पुण्य हो जावे."
इस प्रकार जयशंकर प्रसाद ने अपनी कविता 'आंसू' में व्यक्ति गत वेदना को भूलकर अंत में उसे विश्व - कल्याण की भावना के साथ संबंध कर दिया है. जिस प्रकार राष्ट्रीय - सांस्कृतिक धारा के कवियों में स्वार्थ का निषेध कर समाज के कल्याण के भाव की प्रतिष्ठा दिखाई देती है, उसी प्रकार छायावादी कवि भी व्यक्ति गत वेदना से उपर उठकर करुणा या विश्व -कल्याण की भावना की अभिव्यक्त करने लगते हैं. उसी दृष्टि से 'आंसू' में प्रसाद की अनुभूति व्यक्ति गत निराशा के गर्त से निकल कर विश्व - वेदना के साथ तादात्म्य स्थापित करती हुई मानव जीवन को सुखी बनाने के लिए आकुल हो उठती है. निराशा, आशा की ओर तथा आशा से आत्मोपलब्धि एवं आनंद की ओर गत्यात्मक जीवन साधना का क्रमिक विकास ही जयशंकर प्रसाद कृत 'आंसू' का प्रतिपाद्य है.
🌷🌷🌷🌷 गौरव मिश्रा
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