प्रेमचंद की प्रासंगिकता
प्रेमचंद की पहली महत्वपूर्ण कहानी 'पंचपरमेश्वर' रही है. प्रेमचंद कहानी और उपन्यास की रचना में अपनी महारथ सिद्ध की. उससे समालोचकों के मध्य यह समस्या उत्पन्न होती है कि प्रेमचंद को उपन्यासकार के रूप में माना जाए या कहानी कार के रूप में. डाक्टर रामविलास शर्मा ने हिन्दी साहित्य में उपन्यासकार प्रेमचंद के अस्तित्व को स्वीकार किया है. लेकिन फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रेमचंद ने हिंदी कथा साहित्य को किस्सागोई से रचना के स्तर पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में लोक कथा के तत्वों का प्रयोग किया और जीवन के यथार्थ को कला के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके पूर्व हिंदी कथाकारों ने जीवन को समस्याओं के रूप में देखा लेकिन प्रेमचंद ने जीवन के समक्ष समस्याओं को देख परख कर उन्हें घटित होते प्रस्तुत किया । सामयिक स्थितियों राजनीतिक चेतना राष्ट्रीय भावना एवं सांस्कृतिक जागरण के प्रनेता दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी के सामाजिक दृष्टिकोण से प्रेरित हो प्रेमचंद सामाजिक जीवन से जुड़े। प्रेमचंद ने भारतीय समाज से तादात्म्य स्थापित किया। सामाजिक जीवन के आधार पर रचना करने के कारण प्रेमचंद ने उन्हीं समस्याओं प्रश्नों स्थितियों घटनाओं और चरित्र को अपने कथा साहित्य में ग्रहण किया जो उनके समसामयिक यथार्थ से निकलते हैं उनकी भाषा संवेदना और रचना विधान इसी से निश्चित होते हैं।
प्रेमचंद के साहित्य में वह रंग अधिक है और अंतरंग उसी के अनुरूप है। उन्होंने अपने समाज का यथार्थ पहचाना और उसकी भाषा में ही उसका सर्जन किया। उन्हें समाज की परिस्थितियों से यथार्थ को ग्रहण करने का प्रयास किया और लोग तत्व को रचनात्मक रूप दिया। सामाजिक जीवन की गतिशीलता और संवेदनशीलता के अनुसार यथार्थ को रचनात्मक रूप देने में अग्रसर होते रहे।
प्रेमचंद सामाजिक यथार्थ के कथाकार है। उन्होंने हिंदी कथा को भारतीय जीवन से जोडा और सामाजिक यथार्थ के रचना करने का प्रयास किया । भारतीय जनता के तत्कालीन शत्रु साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठाते हैं पूंजीवाद का विरोध करते हैं। वे शोषक वर्ग की जन विरोधी भूमिका को पहचानते हैं। इसलिए वे महसूस करते हैं कि हमारी लड़ाई सिर्फ अंग्रेज सत्ताधारी ओं से नहीं हिंदुस्तानी सत्ता धारियों से भी है। वे मध्यवर्गीय जीवन यथार्थ से दलितों के जीवन यथार्थ की ओर उन्मुख हुए। यह यथार्थ हृदय विदारक और स्तब्ध कर देने वाला था।' गोदान' की होरी पिछड़ी जाति का है। सिलिया जाति की चमारिन है। 'कफन 'ठाकुर का कुआं 'और 'दूध का दाम 'में दलितों की अपमान भरी जिंदगी के प्रति प्रेम चंद का विद्रोह है।
प्रेमचंद ने धर्म पाजी भी वर्ग के पाखंड को उजागर किया है 'ब्रह्मभोज' और 'सत्त्याग्रह' कहानियों में ब्राह्मणों की मुफ्त खोरी और पाखंड पर व्यंग किया है चौबे जी मोटे राम शास्त्री आज भी हर जगह मिलेंगे उनका मुख्य उद्देश्य सामंती ढांचे पर प्रहार करना दुखी चमार की लाश को ब्राह्मण रस्सी से खींचता है दलितों पर हिंदू अत्याचार का पुराना इतिहास है राष्ट्रीयता की उसकी पहली सर वर्ण व्यवस्था ऊंच-नीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है। उन्होंने धर्म की मार धन की मार से कम कठोर नहीं माना ।
' ठाकुर का कुआं' सामाजिक विभाजन का एक मूर्त बिंब है या सवर्ण और अछूत को न केवल पृथक करता है बल्कि सामाजिक भेद को भी प्रतिबिंबित करता है। वह धनी और गरीब में शासक और शासित में शोषक और शोषित में विद्वान विरोधों को उजागर किया है। 'ठाकुर का कुआं' में महाजन सभ्यता भी उजागर हुआ है। जोखू - गंजी दंपति के मानस में अपनी सामाजिक स्थिति का यथार्थ चित्र है लेकिन उस से छुटकारा पाने का मार्ग मालूम नहीं। इसमें हरिजन की समस्या और मजदूरी तथा सामंती समाज में औरतों की सामान्य दशा पर मौलिक सवाल उठा है। 'ईदगाह 'और ' कफन' पारिवारिक संबंधों पर मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति हुई है प्रेमचंद ने हिंदू और मुसलमान दोनों पर समान रूप से लिखा। मुसलमानों की सामाजिकता उजागर करने में वे नहीं
चुकते। धीखू और माधव जैसे हिंदू और अमीना और हामिद जैसे मुसलमान मिलजुल कर अपनी कथा व्यथा कहते हैं। 'कफन' में हिंदू धर्म की उदारता सहिष्णुता और हिंदू रीति-रिवाजों के बीच काफी विरोधाभास है।
प्रेमचंद की प्रसंगिकता अपने युग की प्रमाणिकता के साथ जुड़ी है उन्होंने जीवन को पूर्णता में ग्रहण करने का प्रयत्न किया। उन्होंने मात्र वास्तु की रचना नहीं की , चरित्रों का सर्जन नहीं किया, बल्कि इन के माध्यम से अपने युग की संस्कृति प्रक्रिया को ग्रहण करने का प्रयास किया। प्रेमचंद की कहानियों का संसार साधारण ग्रामीण ,चमार, धोबी, राजा ,नवाब ,अंग्रेज, पंडित ,मजदूर आदि है। इन सभी साहित्यिक गतिविधियों का, एक ही लक्ष्य है मनुष्यता की सही स्थापना। इसलिए डॉक्टर मदान ने कहा है प्रेमचंद महान उपन्यासकार थे, किंतु वे ज्यादा महान कहानीकार थे। प्रेमचंद ने युग के सख्त के साथ मूल्य चेतना को भी अभिव्यक्ति दी। प्रेमचंद की उतरवर्ती कहानियों में सेवा त्याग, आत्मा अभिमान सहज और यथार्थ प्रवृतियां मिलती है और बाद की कहानियों मे समसामयिकता की छाप यथार्थ प्रवृतियाँ का नया संवेदन और वैचारिक दृढ़ता।🌷🌷🌷🌷
गौरव मिश्रा 🙏
Premchand Hindi Sahitya ke amull dharoher hai. Hindi Sahitya ko samridh karne me inke yogdan ko najerandaj nahi kiya ja sakta.
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteBahoot sundar
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