भारत-भारती :विशेषता

राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त गांधी युग के प्रतिनिधि कवि हैं. गांधीवादी दृष्टि, नैतिक आग्रह एवं सुधारवादी भावों से उनकी रचनाएँ लवरेज है. इनका स्थान भारतीय संस्कृति के उद्गायकों में सर्वोपरि है. अपनी महत्वपूर्ण कृति 'भारत- भारती' गुप्त जी की कृति को प्रसारित करने वाली राष्ट्रीय भावधारा की प्रमुख कृति है.
                      गुप्त जी कृत 'भारत- भारती' उनकी मूल संकल्पनाओं को अभिव्यक्त करती है. यह शिक्षा प्रद कविता का अच्छा उदाहरण है. इसकी मुख्य विषयवस्तु है-- भारत के अतीत का गुणगान करते हुए उसके वर्तमान और भविष्य  को सुदृढ़ करने का प्रयास करना.   'भारत- भारती' का रचना काल 1912-1914 ई० है, इस समय भारत अंग्रेजी परतंत्रता से ग्रस्त था. यही कारण है कि गुप्त जी परतंत्रता से मुक्ति के लिए भारत वर्ष की सांस्कृतिक धरोहर का गुणगान करते हैं. वे भारतीयों के अस्तित्व की रक्षा के लिए जागरण का संदेश देते हुए कहते हैं-- "हम कौन थे, क्या हो गयें हैं, और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएं सभी" 
             'भारत- भारती' तीन खंडों में विभक्त है- अतीत खंड, वर्तमान खंड और भविष्यत् खंड. अतीत खंड में भारत और हिन्दू जाति के स्वर्णिम अतीत का गौरव-गान है, वर्तमान खंड में आधुनिक भारत की गुलामी के लज्जा जनक चित्र हैं तथा भविष्यत् खंड में आधुनिक भारत की गुलामी से मुक्ति एवं उत्थान की कामना है.
               चूंकि 'भारत- भारती' में कवि का मुख्य लक्ष्य हिन्दू समाज को उसके अतीत की पहचान कराकर वर्तमान दशा सुधारने के लिए सचेत करना है अतएव इसमें रुढियों से आबद्ध रसों एवं भावों की व्यंजना नहीं हुई है. इसमें भारत के अतीत- गौरव के अपेक्षा वर्तमान की हीन दशा का वर्णन करके भारतीय जनता को जागृत किया गया है. इसके लिए गुप्त जी पद्यबद्ध काव्य रुप को ग्रहण करते हुए इतिवृत्तात्मक वर्णनों के द्वारा जनता के बीच पहुंचते है.
                 गुप्त जी कृत 'भारत- भारती' एक चिंतन प्रधान काव्य है.अतएव इसमें हर्ष, शोक जैसे संचारी भावों के अतिरिक्त  विचारों का महत्व प्रतिपादित किया गया है. इसका विचार पक्ष काव्य त्वरित की दृष्टि से मह्त्वपूर्ण है. समाज के निर्माण में 'भारत-भारती' जैसी रचनाएँ अनेक स्तरों पर अपनी भूमिका निभाती है. गुप्त जी भविष्यत् खंड में भारतीयों को सही अर्थों में देश भक्ति अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं-----
 "समझों न भार भक्ति केवल भूमि ही के प्रेम को, 
   चाहों सदा निज - देश वासी बंधुओं के क्षेत्र को
  यों तो सभी जड़- जन्तु भी स्वस्थान के अतिरिक्त है
  कृमि, कीट, खग, मृग, मीन भी हमसे अधिक अनुरक्त है"
        गुप्त जी सभी मनुष्य को नम्रता पूर्वक अपनी भारत माता के लिए समर्पित होने का आवाह्न करते हैं. वह हिन्दू और मुसलमान मे कोई फर्क नहीं मानते.वह भारत के दुर्दशा के लिए हिन्दुओंको ही उत्तरदायी समझ कर उन्हें उनके कर्तव्यों का बोध कराते हैं. "हे आर्य संतानों ! उठो अवसर निकल जावे नहीं".
                  गुप्त जी " भारत- भारती " में फैले छुआछूत के भेदभाव को भी हटाने का प्रयत्न करते हैं. वे मानव मात्र की समानता का पक्ष लेते हैं.  "सबसे बड़ा गौरव है हमारे ज्ञान का, जाने चराचर विश्व को हम रुप उस भगवान का."
               इस प्रकार भावना एवं विचार की दृष्टि से 'भारत- भारती' राष्ट्रीय भावना की पूर्ण कृति है. इसमें  गुप्त जी स्वाधीनता संग्राम के सैनिक बनकर संम्पूर्ण जन मानस को कर्तव्य के पथ पर ले चलने का शुभारंभ करते दिखाई पड़ते हैं.इस दृष्टि से 'भारत- भारती' का भाव पक्ष उन्नत एवं समृद्ध है.
                      कला पक्ष की दृष्टि से मैथिली शरण गुप्त कृत 'भारत -भारती' उत्कृष्ट रचना की श्रेणी में नहीं आती है. इसमें कवित्व के स्थान पर तुकबंदी का आश्रय लिया गया है. इसमें कवि का ध्यान इसके कथ्य पर ही ज्यादा केंद्रित है. गुप्त जी ने ' भारत- भारती' में सरल खडी़ बोली  का प्रयोग कर उसे कविता के क्षेत्र में ब्रजभाषा के स्थान पर प्रतिस्थापित किया. इस रचना का कला पक्ष बहुत परिमार्जित न होते हुए भी इसमें ओज, दैन्य, ग्लानि आदि भावों की अभिव्यंजना स्वभाविक रुप से हुई है. उक्ति को स्पष्ट एवं अर्थ व्यंजक बनाने के लिए जगह- जगह अलंकार एवं वाकपटुता की भी अभिव्यक्ति द्रष्टव्य है. इस दृष्टि से  'भारत- भारती' का मंगलाचरण अर्थ व्यंजना एवं भावव्यंजना से परिपूर्ण है. गुप्त जी ने अलंकारों का प्रयोग स्वभाविक रुप से किया है,  यथा उपमा अलंकार की यह उक्ति द्रष्टव्य है--  "संसार में किसका समय एक सा रहता सदा, 
है निशि - दिवा सी घुमती सर्वत्र विपदा- संपदा "
                     अलंकारों के अतिरिक्त गुप्त जी ने प्रसाद गुण सम्पन्न भाषा का अच्छा नमूना पेश किया है. इनकी भाषा में ओज और माधुर्य गुण भी मिलता है. 'भारत - भारती' की मुख्य विशेषता उसकी सहजऔर सरल शब्दावली भी है. यद्यपि गुप्त जी अपने संस्कृत ज्ञान के कारण कहीं- कहीं तत्सम प्रधान पदावली का प्रयोग करते हैं, लेकिन बोलचाल के शब्दों की अधिकता के कारण उनकी भाषा दुर्बोध नहीं हो पाई है. यथा: ---
"अनुकूल शोभा - मूल सुरभित फूल वे कुम्हला गए, 
फलते कहाँ हैं अब यहाँ वे फल रसाल नए- नए."
                   'भारत - भारती' की लोकप्रियता का एक अन्य आधार इसका हरिगीतिका छंद में लिखा जाना भी है.
         इस प्रकार, भाव, कला, प्रासंगिकता आदि दृष्टि से गुप्त जी कृत  'भारत-भारती' एक विशिष्ट रचना है.
                                    🌷🌷🌷🌷
                                      गौरव मिश्रा


Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

दरबारी संस्कृति और रीति काव्य

प्रेमचंद की प्रासंगिकता

आंसू ( काव्य) :---- विशेषता