आंसू ( काव्य) :---- विशेषता

जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्य के जनक होने के कारण आधुनिक काव्य धारा के गौरवमय प्रतिनिधि कवि हैं. प्रसाद जी की कोमल कल्पना ने प्रेम के स्वरुप को उपस्थित करते हुए मधुर और कोमल भावनाओं से कविता को श्रृंगार किया . इस प्रकार, प्रसाद प्रेम एवं सौन्दर्य के कवि हैं. प्रेम उनके काव्य शरीर में आत्मा की तरह व्याप्त है. 'आंसू प्रेम की मधुर स्मृतियों को अभिव्यंजना करने वाला जयशंकर प्रसाद कृत प्रसिद्ध काव्य है, जिसमें प्रेयसी के वियोग में प्रेमी के आंखों से गिरे हुए आंसूओं का संकलन है.
                       'आंसू' में प्रेयसी के नख -शिखर वर्णन में श्रृंगार का परिष्कृत चित्र है. कवि अपने अनुभव के आधार पर 'आंसू' की नारी का निर्माण किया है. उसमें रुप- सौन्दर्य सबकुछ है, जिस पर प्रेमी आकृष्ट हुआ. यह नारी सम्पूर्ण मादकता को लेकर भी केवल वासना का प्रतीक बनकर नहीं रहती. यह कई गुणों से परिपूर्ण है. प्रसाद ने प्रेयसी के शरीर में 'पावनता' का आरोप करते हुए उसमें मधुर आलोक की व्यंजना भी की है. प्रसाद ने नारी को प्रेरणा के रूप में ग्रहण किया. आंसू की प्रेरणा केवल नारी का सौन्दर्य ही नहीं, इससे प्राप्त प्रेम और निराशा 😞😞भी है.
                   'आंसू'😭में  प्रकृति के विभिन्न अंग प्रतीक बनकर आए हैं. आकाश⛅ हृदय बन जाता है तो झंझावात वेदना. प्रकृति संम्पूर्ण भावनाओं का वाहक बनकर आती है. भाव - परिवर्तन के साथ प्रकृति वर्णन में भी नवीन प्रयोग आरंभ होतें हैं. प्रतीक विधान के द्वारा कवि मानव एवं प्रकृति के बीच तादात्म्य स्थापित करता है-- "चातक की चकित पुकारे, 
       श्यामा ध्वनि सरल रसीली, 
       मेरी करुणार्द्र कथा की
       टुकडी आंखों से गीली."
इसी प्रकार प्रकृति अप्रस्तुत को प्रस्तुत करने में भी सहयोग देती है. बिम्बों - प्रतीकों के अतिरिक्त प्रकृति उपमान बनकर भी आती है. प्रकृति के व्यापक रंग मंच की योजना ने 'आंसू'😭  काव्य में वियोग -श्रृंगार के निरुपण में योग दिया है. प्रसाद प्रकृति के कवि नहीं है, अतएव उन्होंने इसका उपयोग अपनी कविताओं में मानवीय भावों के प्रकाशन के लिए किया है.
                      भाव- भाषा एवं शैली की  दृष्टि से आंसू💧' वैसी कविता है, जिसमें प्रेम 🥰 की स्वछंद प्रकृति  को प्रमुखता दी गई है. आलोचकों की दृष्टि में 'आंसू' प्रसाद की काव्य कला का उत्कृष्ट नमूना है. भाषा👄💬 न केवल भावात्मक है, बल्कि उसमें अनूठी लय भी विद्यमान है. इसके शब्दोंं में लाक्षणिकता प्रतीकात्मकता एवं व्यंजना शक्ति द्रष्टव्य है. यथा-- 
                                      "हिलते द्रुमदल किसलय देती गलवाहीं डाली, फूलों का चुम्बन छिडती,
मधुयों की तान निराली."
                      
एक सुंदर गीत सृष्टि के रुप में 'आंसू' एक सफल रचना है. संगीतात्मकता इसमें लाक्षणिकता एवं शब्द चयन में है. श्रेष्ठ गीतिकाव्य के अवयव इसमें समाहित है. बिना किसी स्पष्ट कथानक के समन्वित रुप में प्रभावोत्पत्ति 'आंसू' की श्रेष्ठता है. प्रत्येक छंद भावावेग के द्वारा एक - दूसरे से गुम्फा हैं. बिंब प्रतीक- विधान का भी इसमें जीवंत प्रयोग है. इस प्रकार अपनी विशिष्ट कला के कारण 'आंसू💧 ने एक प्रतिमान स्थापित किया, जिससे छायावादी काव्य के प्रवर्तन में महत्वपूर्ण सहयोग मिला.
                'आंसू💧 काव्य में दार्शनिक चिंतन एवं वियोग अनुभूति का सामंजस्य स्थापित हो गया है. इसमें मर्मस्पर्शी वैयक्तिक अनुभूति के साथ उदात्त दार्शनिक निष्पत्ति इतनी गहराई में जाकर जुड गई है कि दोनों अभिन्न हो गये हैं. 
              'आंसू'💧  के वियोग श्रृंगार में जीवन दर्शन की प्रतिष्ठा उसकी मौलिक विशेषता है. वेदना का दर्शन -रूप में प्रकाशन में प्रस्तुत हुआ है. ' आंसू'💧के विरह में भी जीवन के प्रति जो आशावाद निहित है, वही उसकी निधि है. 'आंसू' लौकिक रुप में प्रस्तुत हुआ और कवि छाया - संकेतों द्वारा मार्मिक अनुभूति का प्रकाशन करता है. कवि यदि अश्रु का दान देता है, तो साथ ही आंसूओ से उपर उठने का संदेश भी ग्रहण करता है. जीवन की मार्मिक और शाश्वत समस्या पर आधारित 'आंसू'💧हिन्दी की विशिष्ट रचना है. डाॅ विमल कुमार के शब्दों में "आंसू' एक उत्कृष्ट विरह काव्य है, जिसमें भाषा की प्रां -जलता, भावों की सुन्दर अभिव्यंजना, विरह वेदना के प्रकाशन में एक सूत्रों, मनोरम अलंकार योजना और सर्वोपरि माधुर्य और प्रसाद गुणों की स्निग्धता चांदनी🌙🌚🌜 की छिटकन अपने उत्कृष्ट रुप में प्रकाशित हुआ है. ------ प्रसाद जी की कृतियों में 'कामायनी' के पश्चात इसी का स्थान है और हिन्दी साहित्य के विरह काव्यों में व्यंजना की दृष्टि से यह अनुपम है.🌷🌷🌷🌷
                                               गौरव मिश्रा

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