निराला: साहित्यिक परिचय
मुक्त छंद के मसीहा, प्रगति वाद के अग्रदूत, छायावाद के आधार स्तंभ प्रयोगवाद के बीजारोपण करने वाले महाप्राण 'निराला' व्यवहार में यथार्थवादी, साहित्य चेतना में ज्ञानवादी, दार्शनिक रुप में नव वेदांती और जीवन में मानवतावादी थे. वे एक ऐसे स्रष्टा एवं जीवन द्रष्टा कवि हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य में नए आयाम स्थापित किये. उनके काव्य में जितना आनंद का अमृत है उतना ही वेदना एवं विषमता का विष है. काव्य शिल्प की दृष्टि से आधुनिक हिंदी के कवि गुरु सूर्य कांत त्रिपाठी निराला को अपनी साफगोई अदम्य साहस के कारण समीक्षकों ने उन्हें 'छायावाद का कबीर' कहा है.
निराला का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषासुर नामक रियासत में सन् 1896 ई०में बसंत पंचमी के दिन हुआ था. काव्य लेखन की अभिरुचि इनमें बचपन से ही थी. प्रारंभ में ही बंगला एवं संस्कृत में कविताएँ करते थे. खडी़ बोली को काव्य भाषा बनने एवं कई कवियों द्वारा रचना रत होने के कारण निराला हिन्दी में कविता करना आरंभ किया.
इनकी साहित्यिक अभिरुचि इतनी अधिक थी इन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी. इसके उपरांत रामकृष्ण मिशन, कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले 'समन्वय' के संपादक हो गये. सन् 1922 ई०में इनका प्रथम कविता संग्रह 'अनामिका' प्रकाशित हुआ. इसी समय कलकत्ता के एक साहित्य प्रेमी सेठ महादेव प्रसाद द्वारा साहित्यिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय जागरण के उद्देश्य से 'मतवाला' नामक साहित्यिक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ. निराला को इसका संपादक नियुक्त किया गया. 'मतवाला'के माध्यम से निराला ने अपनी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया.
'मतवाला' में निराला ने एक वर्ष तक काम किया. इसके बाद कलकत्ता छोड़ कर लखनऊ चले गए. लखनऊ से प्रयाग आये जहाँ उन्होंने अपना शेष जीवन गुजारा. इनकी मृत्यु 15अगस्त 1961 को हुई.
निराला जी की साहित्यिक रचनाएँ इस प्रकार है----- (1) कविता संग्रह-- अनामिका (1923ई0 प्रथम भाग), परिमल(1940), अनामिका (द्वितीय भाग1938), गीतिका (1939), कुकुरमुत्ता (1942), अणिमा (1943), बेला (1946), न ए पत्ते (1946), अपराध(1950), अराधना (1953), अर्चना (1950), तथा रामचरितमानस का खडी़ बोली में रुपांतरण
(2) खंड काव्य--- तुलसी दास (1938)
(3) उपन्यास----- अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, चोटी की पकड़, काले कारनामे, उच्छृंखल तथा चमेली.
(4) कहानी संग्रह--- लिली, सखी, चतूरी चमार, सुकुल की बीबी.
(5) रेखाचित्र--कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा
(6) निबंध संग्रह---प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, प्रबंध परिचय
(7) आलोचनात्मक ग्रंथ----रविन्द्र कविता कानन
सुविधा की दृष्टि से निराला की कविताओं को दो भागों में बांटा जा सकता है. प्रथम खंड में 'अनामिका'(1923) से 'तुलसी दास' (1938) तक की रचनाओं को रखा जा सकता है जो छायावादी संस्कार से प्रभावित है. सन् 1942 के'कुकुरमुत्ता का प्रकाशन काल से निराला की कविता को दूसरे खंड में रखा जा सकता है जिसमें प्रगतिशीलता की छाप है.
इस प्रकार निराला बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचना कार थे, परंतु उनकी प्रतिभा का निखार सर्वाधिक कविता में ही हुआ है. वे आधुनिक हिंदी साहित्य के महाकवि हैं आज की कविता का विराट ् भू -भाग सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की भावभूमि से आच्छादित है इसके पीछे निराला की यथार्थवादी चेतना का ही विस्फोट है. निराला केवल मुक्त छंद के मसीहा कवि नहीं हैं, बल्कि 20 वी शताब्दी की हिन्दी कविता में यथार्थवादी कविता के पहले महाकवि हैं. निराला इसलिए महान कवि नहीं हैं कि उन्होंने हिन्दी कविता की दुनिया में युगांतर उपस्थित किया, बल्कि उनका व्यकि्तत्व भी उनकी कविता की तरह महान और आदर्शमय है.🌷🌷🌷🌷
गौरव मिश्रा
Bahut achha
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