रीति कालीन काव्य की विशेषताएं
रीति कालीन काव्य की विशेषताएं---
हिन्दी साहित्य का उत्तर मध्यकाल रीति काल के नाम से जाना जाता है.राजाओं एवं सामंतों द्वारा कवियों को प्रश्रय का उद्देश्य केवल और केवल दरवारी प्रवृत्ति को बढ़ावा देनाऔर काव्यगत मनोरंजन प्राप्त करना था. रीति कालीन आचार्यों ने काव्य गत विषि्टताओं को राज दरबार में गिरवी रख दिया था. अर्थात कवि गण कहीं न कहीं समाज और नागरिकों से दूर हो गये थें. कवियों का उद्देश्य राजाओं और सामंतों की चाटुकारिता धनोपार्जन और विलासिता मात्र रह गया था. सिक्के की कीमत पर काव्य रचना की प्रवृत्ति तत्कालीन कवियों में घर कर गई थी.
भक्तिकालीन कवियों के विपरीत रीति कालीन कवियों मे परहित का अभाव था. राम और कृष्ण को केन्द्र में रखकर काव्य की रचना तो की गई थी ,लेकिन श्रृंगार ,नायिका भेद, नख -शिख वर्णन ऋतु वर्णन के आदि के कारण रीति कालीन काव्य को भक्ति काव्य मानना उचित प्रतीत नहीं होता. कवियों के द्वारा काव्य में पांडित्य प्रदर्शन, और काव्यों में अधिक चमत्कार उत्पन्न करने का भी प्रयास किया गया है.
रीति का अर्थ है --शैली. चूंकि रीति कालीन कवियों ने एक विशेष शैली का प्रयोग किया और तत्कालीन समस्त रचनाएँ उसी शैली के इर्दगिर्द घुमती रही, इसलिए इसे रीति काल कहा गया है.इस शैली के अन्तर्गत श्रृंगार, नख-शिख वर्णन ,नायिका भेद आदि का अतिशय प्रयोग हुआ है जोकि इस काल की काव्यगत विशेषता रही है.
रीति काल की काव्यगत विशेषताओं को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है----
लौकिक श्रृंगारिकता--- रीति कालीन कवियों ने मुख्य रूप से अपनी रचनाओं में श्रृंगार रस का वर्णन किया है. नायिकाओं के नखशिख वर्णन और कटाक्ष आदि का वर्णन मुख्य रूप से किया गया है. इसलिए तत्कालीन काव्य सीमित है. नारी को केवल भोग्य की वस्तु माना गया है. माँ, बहनऔर पुत्री के रूप मे समाज में स्थान गौन है.
नायिका भेद---तत्कालीन कवियों ने नायिका भेद का वर्णन करते हुए सामाजिक मर्यादा का भी ध्यान नहीं रखा है. नायिका वर्णन बहुत ही उतेजक और कामुकता से परिपूर्ण है.
अलंकारिता---इस काल के कवि अलंकार प्रिय रहे हैं.व वे मानते थे अलंकार के बिना कविता रचना नहीं हो सकती. उपमा, अतिश्योक्ति , अनुप्रास आदि अलंकारों का कवियों द्वारा प्रयोग हुआ है.
ब्रजभाषा---ब्रजभाषा की मधुरता रीति कालीन कवियों को अपनी तरफ़ खींचीं है. ब्रजभाषा का प्रयोग इस काल की प्रमुख विशेषता रही है.
मुक्तक काव्य---रीति काल में प्रबंध काव्य का प्रचलन नहीं रहा था. सभी कवियों ने मुक्तक काव्य शैली को अपनाया है.क्योंकि श्रृंगार वर्णन के लिए यह शैली उपयुक्त मानी जाती रही थी. साथ ही इस काल में भाव पक्ष के अपेक्षा कलापक्ष ज्यादा मह्त्वपूर्ण माना गया इसलिए कवियों द्वारा चित्र योजना, अलंकार योजना, नाद योजना तथा छंद योजना को महत्व दिया गया था.
निष्कर्षतःयह कहा जा सकता है कि रीति कालीन कवियों के द्वारा समाज में कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं की गई क्योंकि श्रृंगारिकता और विलासिता की प्रवृत्ति कवियों में घर कर गयी थी. काव्य में अधिक चमत्कार उत्पन्न करने के कारण कला पक्ष महत्वपूर्ण प्रतीत होता है. डाक्टर भागिरथ मिश्र के शब्दों में----इस धारा के कवियों ने जीवन के लिए अदम्य वासना जागृत कर दी है सौन्दर्यानुभूति और सुरुचि की सुकुमार कसौटी प्रदान की है. केवल चेतावनी एक काव्य के विषय में दी जा सकती हैऔर वह है कि उसे चूने हुए काव्य के रूप में पढना अधिक श्रेष्टकर है.🌷🌷🌷🌷
गौरव मिश्रा
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